अभिव्यक्ति की आजादीः गालियों का पिटारा, खनखनाती थैलियां !

इन दिनों मीडिया का, विशेषकर सोशल मीडिया का खूब रौला है। जो चाहो लिख दो, जो चाहो कह दो, न इन पर प्रेस एंड न्यूज़पेपर रजिस्ट्रेशन एक्ट लागू होता, न कोई आई.टी. एक्ट की ही परवाह करता है। नये आई.पी.सी. को अभी जानता ही कौन है जो इसकी चिंता करे। इस लोकतंत्र में (जबकि विपक्षी नेता कहते हैं कि मोदी ने लोकतंत्र को दफना दिया) बे-लगाम घोड़े की तरह सोशल मीडिया सरपट दौड़ रहा है।

करीब-करीब प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के भी ऐसे ही लक्षण हैं। 5-5, 7-7 राज्यों से 30-30 एडिशन छापने वाले कलम को जुम्बिश देकर न जाने कब क्या लिख मारें! जो नेता घर-घर, गली-गली घूम कर चप्पल घिसा चुका है उसके बारे में लिख दें- लो, चुनाव आते ही नेता जी का विरोध शुरू हो गया। कब्र में जा चुके माफिया पर अफसोस जता सकते हैं कि जिसके लिए जेल में तालाब खोदे जाते थे कि वह ताजा मछलियां खा सके, उसे ठंडी खिचड़ी दी जा रही थी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इससे भी आगे है। दर्शक जिन्हें एंकर समझते हैं वे कभी कोतवाल, कभी जज तो कभी हंटर मास्टर बन जाते हैं। कमाल यह है कि ये चुनाव विश्लेषण के नाम पर जिसे चाहे जिता दें, चाहे किसी को हरा दें। एग्जिट पोल के करतब न्यारे हैं ही।

इस सब के बावजूद देश की अदालतें लोकतंत्र, संविधान व कानून की रक्षा हेतु अच्छा निर्णय कर लेती हैं।

वाराणसी के पत्रकार अमित मौर्य की अपील रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस मंजू रानी चौहान ने अपने आदेश में लिखा है कि आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम लेकर किसी के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण लेखन नहीं छाप सकते। असह‌मति व आलोचना का लोकतांत्रिक अधिकार सभी को प्राप्त है किन्तु अभिव्यक्ति गरिमा के अनुरूप होनी चाहिए। अनर्गल निन्दा से पत्रकारिता की गरिमा को धूमिल करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। मीडिया को धन उगाही के लिए इस अधिकार का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

जस्टिस मंजू रानी चौहान का आदेश एजेंडावादी मीडिया की स्थिति ठीक से बयाँ करता है।

गोविन्द वर्मा
संपादक ‘देहात’

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