सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी से 13 दिन बात न करना क्रूरता नहीं

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैवाहिक जीवन में मतभेद और संवाद में अस्थायी दूरी सामान्य बात है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ दिनों तक पत्नी से बातचीत न करने के आधार पर किसी पति को क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
क्या था पूरा मामला
यह मामला एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसे निचली अदालत और मद्रास हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत क्रूरता का दोषी मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई थी। आरोप था कि पति ने अपनी पत्नी से लगभग 13 दिनों तक बात नहीं की, जिसके बाद महिला ने आत्महत्या कर ली।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस सजा को रद्द करते हुए आरोपी पति को बरी कर दिया।
‘केवल संवाद बंद होना क्रूरता नहीं’ – सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि वैवाहिक जीवन में तकरार और संवाद में अस्थायी रुकावट सामान्य परिस्थितियां हैं। इसे तब तक क्रूरता नहीं माना जा सकता जब तक इसके पीछे ठोस और गंभीर परिस्थितियां साबित न हों।
अदालत ने कहा कि इस मामले में केवल 13 दिनों तक बातचीत न होना, बिना किसी मजबूत सबूत के, क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता।
सबूतों की कमी पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि पति के व्यवहार ने पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपों को साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह अभियोजन पर होती है, न कि आरोपी पर।
पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों की सही तरह से समीक्षा नहीं की, जिसके कारण गलत निष्कर्ष निकाला गया।
दहेज और उत्पीड़न के आरोप
मामले में आरोप लगाया गया था कि शादी के समय महिला के परिवार ने करीब 3 लाख रुपये नकद, 20 तोला सोना और अन्य उपहार दिए थे। इसके बावजूद अतिरिक्त दहेज की मांग और उत्पीड़न के आरोप भी लगाए गए थे।
यह भी दावा किया गया कि पति ने पत्नी को मायके जाने और फोन पर संपर्क न करने को लेकर फटकार लगाई थी, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान थी।
निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक मामला
निचली अदालत और हाई कोर्ट ने पति को दोषी ठहराते हुए सजा बरकरार रखी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सभी तथ्यों और सबूतों की पुनः समीक्षा के बाद कहा कि केवल संवाद की कमी को क्रूरता नहीं माना जा सकता, और इस आधार पर आरोपी को बरी कर दिया।
इस फैसले को वैवाहिक विवादों और 498A मामलों की व्याख्या के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
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