प.बंगाल में हिन्दू उत्पीड़‌न की दूसरी लहर !

देश के सभी न्यूज़ चैनलों ने उत्तर दिनाजपुर के एक स्थान में महिला के साथ सड़क पर सरेआम बरती जा रही बर्बरता और निर्लज्जता के घृणित कुकृत्य के दृश्य दिखाये हैं। अपने उत्तरदायित्वों और पीड़िता की मर्यादा की रक्षा करते हुए चैनलों ने महिला का चेहरा, फटे कपड़े, अर्द्धनग्न काया को ब्लर (धुंधला) कर दिया किन्तु यह साफ-साफ दिखाया कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के एक मुस्लिम कार्यकर्ता तजमुल उर्फ जेसीबी ने कैसे सरेआम महिला को क्रूरता के साथ डंडों से पीटा, सिर के बाल पकड़ कर सड़क पर घसीटा तथा बुरी तरह बेइज्जत किया।

इस कड़वी सच्चाई को बार-बार दोहराने का क्या अर्थ रह गया है कि पश्चिमी बंगाल में हिन्दुओं पर अत्याचार कराने में हिन्दुओं की दुकानें, मकान फुंकवाने में ममता बनर्जी मुस्लिम लीग जिन्ना व सहरावर्दी से भी आगे निकल गई हैं जिसने डायरेक्ट एक्शन के नाम पर एक ही रात में 30 हजार हिन्दु‌ओं का कत्लेआम करा दिया था।

पश्चिमी बंगाल के विधानसभा चुनावों के बाद ममता के पालतू गुंडों ने चिह्नित करके हिन्दुओं के मकानों, दुकानों में आग लगाई, संपत्तियों को लूटा, मारकाट की। राष्ट्रीय मानव आयोग की टीम पर, मीडिया कर्मियों पर हमले किये गए। दस हजार से अधिक हिन्दू स्त्री-पुरुष-बच्चे पश्चिमी बंगाल से पलायन कर गए। अख़बारों ने लिखा कि ममता राज में हिन्दुओं की स्थिति 1947 के बंटवारे के समय से भी भयावह है। राज्यपाल एवं हाईकोर्ट ने बार-बार लिखा कि ममता राज में कानून व्यवस्था खत्म हो चुकी है। यहाँ तक कि टीएमसी के गुंडों ने 250 से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी। ममता लगातार बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठियों को उकसाती रहीं। दिल्ली के पूर्व सांसद प्रवेश वर्मा ने एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमे साफ-साफ दिखाई पड़ रहा था कि, लुंगीधारी गुंडा महिला के सिर के बाल पकड़कर घसीट रहा है। महिला चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि इसने मेरे मुंह में जबरदस्ती गोमांस ठूस कर मेरा धर्म भ्रष्ट किया। पास में ही ममता की पुलिस का सिपाही चुपचाप खड़ा तमाशा देख रहा है।

लोकसभा चुनावों के बाद ममता राज में हिन्दुओं का उत्पीड़न फिर शुरू हो गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस हरीश टंडन व जस्टिस हिरण्मय भट्टाचार्य ने 22 मई, 2024 को हिंसा की नई लहर पर ममता सरकार को फिर फट‌कार लगाई किन्तु दिल्ली के दरबारी अभी भी मौन, शांत, गूंगे, बहरे बने बैठे हैं।

गोविन्द वर्मा
संपादक ‘देहात’

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