कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाल ही में एक यौन उत्पीड़न मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने कहा कि यदि शादी नहीं हुई और संबंध टूट गया, तो आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को अकेले इस आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
कोर्ट का तर्क
इस मामले में जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) की बेंच ने कहा कि शुरू से ही यदि धोखा देने या गलत इरादे का उद्देश्य न हो, तो शारीरिक संबंध केवल आपसी सहमति पर आधारित माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी और महिला ने एक-दूसरे के साथ कई बार समय बिताया, कई जगहों पर घूमे और होटलों में पति-पत्नी जैसी भूमिका निभाई, जिससे स्पष्ट रूप से दोनों की सहमति का संकेत मिलता है।
केस रद्द
जानकारी के अनुसार, 16 फरवरी को हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया। आरोप थे कि आरोपी ने शादी का वादा कर महिला के साथ दुष्कर्म किया और गर्भपात करवा दिया। लेकिन कोर्ट ने पाया कि महिला ने मामले के दौरान रिश्ता जारी रखा और यौन संबंध भी बनाए।
जज ने कहा, “शुरुआत से ही धोखा देने या गलत इरादे का होना जरूरी था। इसमें महिला को यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया गया हो। ऐसा इस मामले में साबित नहीं हुआ।"
महिला ने क्या आरोप लगाए थे
महिला ने आरोप लगाया था कि उसे कुछ पिलाकर उसके साथ जबरन संबंध बनाए गए और शादी का वादा किया गया। दोनों ने कई जगह घूमने के दौरान शारीरिक संबंध बनाए। महिला गर्भवती हुई और दोनों की सहमति से गर्भपात किया गया। साल 2022 में आरोपी ने शादी से इनकार किया और उसी साल महिला ने पश्चिम मिदनापुर में केस दर्ज कराया। आरोपी को 23 फरवरी को गिरफ्तार किया गया था।
कोर्ट की टिप्पणी
जज ने यह भी कहा कि शिकायत दर्ज करने के बजाय महिला ने रिश्ता जारी रखा। इससे यह स्पष्ट होता है कि पिछले पांच-छह वर्षों में कोई ऐसी स्थिति नहीं बनी थी जिससे महिला किसी गलतफहमी में रही हो।