देश के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में किसी भी बड़ी दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा 3,000 करोड़ रुपये तय करने वाले 2025 के नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इसे बेहद संवेदनशील और नीति-निर्धारण से जुड़ा विषय बताया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला सीधे तौर पर राष्ट्रीय आर्थिक नीति और नागरिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। अदालत ने माना कि यह सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़ा मुद्दा है।

नागरिक सुरक्षा बनाम नीति निर्धारण पर बहस

सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि अगर कभी कोई गंभीर परमाणु दुर्घटना होती है, तो क्या देश में पीड़ितों के लिए पर्याप्त और प्रभावी मुआवजा तंत्र मौजूद है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि मुआवजे की सीमा तय करना गंभीर जोखिम को नजरअंदाज करने जैसा है। उन्होंने 2011 के फुकुशिमा परमाणु हादसे का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे हादसों में नुकसान तय सीमा से कई गुना अधिक होता है। उनके अनुसार, यह कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कमजोर करता है।

सरकार और तकनीकी पहलू पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में विदेशी तकनीक और निवेश की आवश्यकता होती है। ऐसे में अगर देनदारी की कोई सीमा न हो, तो कंपनियां भारत में निवेश से बच सकती हैं।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि यदि किसी दुर्घटना की स्थिति बनती है, तो राज्य सरकारों की भूमिका भी मुआवजा व्यवस्था में महत्वपूर्ण होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि देनदारी सीमा तय करने से अदालत या ट्रिब्यूनल की क्षतिपूर्ति देने की शक्ति प्रभावित नहीं होती।

अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों पर बहस

बहस के दौरान कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई ऐसा देश है जो परमाणु ऊर्जा का उपयोग नहीं कर रहा। इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि जापान और जर्मनी जैसे देशों ने परमाणु संयंत्रों में कटौती की है, जबकि अमेरिका में देनदारी सीमा भारत की तुलना में कहीं अधिक है।

उन्होंने आरोप लगाया कि नया कानून विदेशी कंपनियों को सुरक्षा मानकों में ढील देने जैसा है और इससे आम नागरिकों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

पुराने कानून से तुलना

याचिका में कहा गया है कि नया कानून 2010 के सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट में बदलाव करता है और निजी कंपनियों को 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी से राहत देता है।

साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के 1987 के ओलियम गैस रिसाव मामले में तय ‘पूर्ण उत्तरदायित्व’ सिद्धांत के विपरीत है।