नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या के मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि समाज में फैल रही इस कुरीति के खिलाफ न्यायपालिका किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतेगी। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दहेज हत्या के आरोपी पति को केवल इस आधार पर जमानत दे दी गई थी कि वह कुछ समय से जेल में था।
क्या है मामला
यह मामला बिहार के गोपालपुर थाना क्षेत्र का है। 1 सितंबर 2024 को दर्ज एफआईआर के अनुसार, मृत महिला की शादी को करीब डेढ़ साल ही हुए थे। मृतका की मां लाल मुनी देवी ने आरोप लगाया कि शादी के समय उन्होंने करीब 20 लाख रुपये नकद और लगभग 6 लाख रुपये के जेवर दिए थे। इसके बावजूद ससुराल पक्ष की ओर से लगातार कार और अन्य सामान की मांग की जाती रही।
परिवार के अनुसार, दहेज की मांग पूरी न होने पर महिला को लगातार प्रताड़ित किया जाता था। शादी के कुछ ही महीनों बाद पति के किसी अन्य महिला के साथ संबंध होने की बात भी सामने आई। जब मृतका ने इसका विरोध किया तो परिस्थितियां और बिगड़ गईं और बाद में उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने आरोपी की जमानत रद्द करते हुए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का विशेष उल्लेख किया। रिपोर्ट में बताया गया कि महिला की मौत सामान्य नहीं थी। उसके सिर की हड्डी टूटी हुई थी, दिमाग की नसों में गंभीर चोटें थीं और सीने तथा हृदय को भी गंभीर नुकसान पहुंचा था।
हाईकोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पटना हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े अहम सबूतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया और जमानत देते समय एक तरह से “मैकेनिकल अप्रोच” अपनाई। अदालत ने कहा कि आज के समय में दहेज हत्या समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है, इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों में सबूतों का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए।
पीठ ने यह भी कहा कि केवल यह तर्क कि आरोपी कुछ समय से जेल में है या मुकदमे की प्रक्रिया धीमी है, जमानत देने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। इससे न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
प्रताड़ना के कारण आत्महत्या भी दहेज हत्या
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला ने दहेज के लिए की गई प्रताड़ना के कारण आत्महत्या की है, तो भी उसे कानून के तहत दहेज हत्या की श्रेणी में माना जाएगा।
एक सप्ताह में सरेंडर का आदेश
शीर्ष अदालत ने आरोपी पति को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। साथ ही निचली अदालत को आदेश दिया गया है कि मामले की सुनवाई छह महीने के भीतर प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाए।