उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर होना मुश्किल नजर आ रहा है। संकेत मिल रहे हैं कि अब पंचायत चुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव की प्रक्रिया निर्धारित समय में पूरी होना संभव नहीं दिख रहा।
प्रदेश में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों का कार्यकाल क्रमशः मई और जुलाई में समाप्त हो रहा है। वहीं, पंचायत चुनाव के लिए अंतिम मतदाता सूची 15 अप्रैल को जारी होनी है। इसके बाद आरक्षण तय करने और अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, जिसके लिए पर्याप्त समय नहीं बचता।
कार्यकाल बढ़ाने या प्रशासक नियुक्त करने पर विचार
ऐसे में सरकार के सामने मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल बढ़ाने का विकल्प सामने आ सकता है। यदि इसमें कानूनी अड़चन आती है, तो प्रशासक नियुक्त करने की संभावना भी जताई जा रही है।
राजनीतिक दलों का फोकस विधानसभा चुनाव पर
सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही फिलहाल पंचायत चुनाव कराने के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं। सभी प्रमुख दलों का ध्यान 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित है, जिसके चलते स्थानीय चुनावों को प्राथमिकता नहीं दी जा रही।
पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भी संकेत दिए हैं कि फिलहाल किसी भी दल की ओर से पंचायत चुनाव कराने की मांग सामने नहीं आई है।
मामला हाईकोर्ट में पहुंचा
पंचायत चुनाव को लेकर मामला हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मतदाता सूची, आरक्षण प्रक्रिया और चुनाव की तैयारियों के लिए समय बेहद कम है, जिससे चुनाव टलने की संभावना बढ़ गई है। अदालत ने इस मामले में राज्य निर्वाचन आयोग से हलफनामा भी मांगा है, जिसमें तैयारियों की स्थिति स्पष्ट की गई है।
आरक्षण प्रक्रिया भी बनी वजह
पंचायत चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आरक्षण की प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है। इसके लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन और उसकी रिपोर्ट आना आवश्यक है। आयोग जिलों में ओबीसी आबादी का आकलन कर आरक्षण का निर्धारण करता है, जिसमें समय लगता है।
ऐसे में मौजूदा हालात को देखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव अब तय समय पर नहीं हो पाएंगे और नई पंचायतों के गठन में देरी होगी।