चिपको आंदोलन की दिग्गज नेत्री बचनी देवी का निधन, 100 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

HIGHLIGHTS
- टिहरी जिले की हेंवलघाटी में चिपको आंदोलन से जुड़ी जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता बचनी देवी का निधन हो गया है।
- लगभग 100 वर्ष की आयु में उन्होंने देहरादून स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली।
- उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है।
- नई टिहरी के नरेंद्रनगर ब्लॉक के अदवाणी गांव की रहने वाली बचनी देवी का जीवन पूरी तरह जंगलों और प्रकृति की रक्षा को समर्पित रहा।
- खास बात यह रही कि उनके पति प्रधान पद पर रहते हुए और जंगलों के ठेकेदार होने के बावजूद बचनी देवी ने पेड़ों की कटाई का खुलकर विरोध किया और अपने परिव…
टिहरी जिले की हेंवलघाटी में चिपको आंदोलन से जुड़ी जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता बचनी देवी का निधन हो गया है। लगभग 100 वर्ष की आयु में उन्होंने देहरादून स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है।
नई टिहरी के नरेंद्रनगर ब्लॉक के अदवाणी गांव की रहने वाली बचनी देवी का जीवन पूरी तरह जंगलों और प्रकृति की रक्षा को समर्पित रहा। खास बात यह रही कि उनके पति प्रधान पद पर रहते हुए और जंगलों के ठेकेदार होने के बावजूद बचनी देवी ने पेड़ों की कटाई का खुलकर विरोध किया और अपने परिवार की परंपरा के खिलाफ जाकर भी जंगलों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
रविवार को उनके पैतृक गांव शिवपुरी के घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां बड़ी संख्या में लोग अंतिम विदाई देने पहुंचे।
वर्ष 1977 में हेंवलघाटी के अदवाणी क्षेत्र में जब जंगलों की कटाई को सरकारी मंजूरी मिली थी, तब धूम सिंह नेगी, विजय जड़धारी और सुदेशा बहन के साथ बचनी देवी ने भी इस फैसले का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने क्षेत्र की महिलाओं को संगठित कर आंदोलन को मजबूती दी और लगातार विरोध प्रदर्शन में सक्रिय भूमिका निभाई।
कई दिनों तक परिवार के विरोध और सामाजिक दबाव के बावजूद उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा, जिसके बाद अंततः सरकार को अदवाणी क्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर रोक लगानी पड़ी।
चिपको आंदोलन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता विजय जड़धारी ने कहा कि बचनी देवी ने आंदोलन की भावना को सच्चे अर्थों में जिया और जंगलों की रक्षा के लिए उनका योगदान हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उन्होंने बताया कि बचनी देवी जीवनभर प्रकृति से जुड़ी रहीं और इसी कारण वे दीर्घायु भी रहीं।
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