सीएपीएफ कर्मचारियों के मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई वैध: सुप्रीम कोर्ट

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) से जुड़े मामलों पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
- अदालत ने कहा कि इन बलों के कर्मियों, जिनमें सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान भी शामिल हैं, की सेवा समाप्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट कर सकता है, भले ही विवाद की वजह या घटना देश के किसी अन्य हिस्से में हुई हो।
- यह फैसला न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एक BSF कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।…
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) से जुड़े मामलों पर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि इन बलों के कर्मियों, जिनमें सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान भी शामिल हैं, की सेवा समाप्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट कर सकता है, भले ही विवाद की वजह या घटना देश के किसी अन्य हिस्से में हुई हो।
यह फैसला न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एक BSF कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। कांस्टेबल ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी, जिसमें उसे बिना पेंशन लाभ के सेवा से हटा दिया गया था।
बर्खास्तगी का मामला क्या था
मामला एक BSF कांस्टेबल से जुड़ा है, जिसे 2022 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। आरोप था कि उसने पहली शादी के रहते हुए और पहली पत्नी की अनुमति के बिना दूसरी शादी की थी।
कांस्टेबल को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में तैनाती के दौरान कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। तय समय में जवाब न देने पर कमांडेंट ने उसे सेवा से हटा दिया। बाद में उसकी वैधानिक याचिका भी खारिज कर दी गई।
इसके बाद उसने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, यह कहते हुए कि BSF के महानिदेशक और गृह मंत्रालय जैसे संबंधित दफ्तर दिल्ली में स्थित हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि यह “फोरम नॉन कन्वीनियंस” के सिद्धांत के तहत उचित मंच नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के रुख से असहमति जताते हुए कहा कि संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के मामलों में केवल सुविधा के आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यदि केंद्र सरकार या CAPF के शीर्ष प्रशासनिक कार्यालय दिल्ली में स्थित हैं, तो वहां की हाईकोर्ट को सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, चाहे विवाद की उत्पत्ति कहीं भी हुई हो।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में “फोरम नॉन कन्वीनियंस” का सिद्धांत सामान्यतः लागू नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब जब मामला मौलिक अधिकारों और सेवा संबंधी संवैधानिक उपचार से जुड़ा हो।
हाईकोर्ट के फैसले पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में “फोरम नॉन कन्वीनियंस” के सिद्धांत का गलत उपयोग किया था। अदालत ने माना कि अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर करने का अधिकार केवल घटना स्थल पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उस प्राधिकरण के कार्यालय की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है जिसके खिलाफ आदेश जारी हुआ है।
नतीजा
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने CAPF कर्मियों से जुड़े मामलों में न्यायिक अधिकार क्षेत्र को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे कई मामलों के लिए दिशा-निर्देश का काम करेगा, जहां सेवा संबंधी विवाद अलग-अलग राज्यों से जुड़ा होने के बावजूद केंद्र सरकार के अधीन आते हैं।
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