विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाने और रुपये पर दबाव कम करने के उद्देश्य से सरकार ने एक बड़ा आर्थिक कदम उठाया है। शुक्रवार को जारी अध्यादेश के तहत आयकर कानून में संशोधन करते हुए विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) को सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) से होने वाले लंबे अवधि के पूंजीगत लाभ (LTCG) कर से पूरी तरह छूट दे दी गई है। सरकार का मकसद भारतीय डेट मार्केट को विदेशी निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाना है।

क्या बदला गया नए अध्यादेश में?

पहले FII को इक्विटी और डेट निवेश से होने वाले दीर्घकालिक लाभ पर 12.5% तक LTCG टैक्स देना पड़ता था। अब सरकारी बॉन्ड्स और प्रतिभूतियों पर इस कर को समाप्त कर दिया गया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक भारतीय शेयर बाजार से लगभग 2.6 लाख करोड़ रुपये की निकासी कर ली है। जून की शुरुआत में भी भारी आउटफ्लो दर्ज किया गया है।

रुपये पर दबाव और बाजार की स्थिति

विदेशी निवेश की निकासी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और व्यापार घाटे के दबाव के बीच भारतीय रुपया कमजोर हुआ है। हाल के महीनों में रुपया ऐतिहासिक निचले स्तरों के आसपास पहुंच गया है और इस साल अब तक इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और पूंजी बहिर्गमन ने रुपये की स्थिति को और कमजोर किया है, जिससे मुद्रा बाजार पर लगातार दबाव बना हुआ है।

सरकारी बॉन्ड्स होंगे ज्यादा आकर्षक

सरकारी प्रतिभूतियां (G-Secs) केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी सुरक्षित निवेश साधन होते हैं। कर छूट मिलने के बाद इन साधनों से मिलने वाला रिटर्न अब विदेशी निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक हो जाएगा।

इससे उम्मीद है कि लंबी अवधि की स्थिर विदेशी पूंजी भारत के डेट मार्केट में बढ़ेगी और सरकार को विकास परियोजनाओं के लिए धन जुटाने में आसानी होगी।

विदेशी मुद्रा भंडार और RBI की भूमिका

रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक (RBI) लगातार हस्तक्षेप कर रहा है। डॉलर की बिक्री के कारण हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट देखी गई है, हालांकि यह अभी भी मजबूत स्तर पर बना हुआ है।

RBI की कोशिश है कि बाजार में स्थिरता बनी रहे और अचानक पूंजी निकासी के प्रभाव को कम किया जा सके।

अर्थव्यवस्था पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कर छूट से विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में उनकी भागीदारी में वृद्धि हो सकती है। इससे अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ेगी और दीर्घकालिक निवेश को मजबूती मिलेगी।

सरकार का यह कदम भारतीय वित्तीय बाजार को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन माना जा रहा है।