भारत का विमानन (एविएशन) क्षेत्र इस समय गंभीर आर्थिक दबाव और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) ने चालू वित्त वर्ष FY2027 के लिए भारतीय एयरलाइंस के शुद्ध घाटे का अनुमान बढ़ाकर 36,000 से 38,000 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। रुपये की कमजोरी, महंगा जेट ईंधन और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव इस संकट को और गहरा रहे हैं।

घाटा इतना बढ़ा क्यों?

पहले इक्रा ने अनुमान लगाया था कि बेहतर यात्री मांग के चलते घाटा घटकर 11,000–12,000 करोड़ रुपये तक आ सकता है, लेकिन हालात उम्मीद से काफी खराब निकले। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं—

रुपये में कमजोरी: डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से एयरलाइंस पर भारी विदेशी मुद्रा (Forex) नुकसान बढ़ा है।

लीज और ऑपरेशनल कॉस्ट: नए विमानों की लगातार डिलीवरी के चलते एयरलाइंस का लीज रेंटल बोझ तेजी से बढ़ा है।

खर्च और किराये का असंतुलन: परिचालन लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन एयरलाइंस पूरी तरह इसका बोझ यात्रियों पर नहीं डाल पा रहीं, जिससे मुनाफा प्रभावित हो रहा है।

पिछले वित्त वर्ष में भी इंडस्ट्री का घाटा अनुमान से कहीं अधिक बढ़कर 32,000–34,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।

पश्चिम एशिया संकट का असर

फरवरी 2026 के बाद शुरू हुए पश्चिम एशिया तनाव ने स्थिति और बिगाड़ दी है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण ईंधन लागत बढ़ी है, जिसका सीधा असर हवाई किरायों और मांग पर पड़ा है। महंगाई और बढ़े खर्च के चलते गैर-जरूरी यात्रा में भी गिरावट देखी गई है।

यात्री ट्रैफिक पर दबाव

इक्रा ने यात्री वृद्धि के अनुमान में भी कटौती की है—

  • घरेलू ट्रैफिक: 6–8% से घटाकर 3–6%
  • अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक: 8–10% से घटाकर 0–3%

अप्रैल 2026 में अंतरराष्ट्रीय यात्री यातायात में 39% की भारी गिरावट दर्ज की गई। हालांकि मई 2026 में घरेलू यात्रियों की संख्या 1.56 करोड़ रही, जो सालाना आधार पर 11.3% की बढ़ोतरी दिखाती है। इसी दौरान लोड फैक्टर बढ़कर 88.8% तक पहुंच गया।

ईंधन की कीमतें बनी सबसे बड़ी चुनौती

एविएशन सेक्टर में जेट फ्यूल (ATF) सबसे बड़ा खर्च है।

  • जून 2026 में ATF कीमतें सालाना आधार पर 26.9% अधिक रहीं
  • पहली तिमाही में यह बढ़ोतरी 22.8% दर्ज की गई

हालांकि मासिक स्तर पर कीमतें स्थिर रहीं, लेकिन ऊंची सालाना लागत ने एयरलाइंस पर दबाव बनाए रखा है।

आगे की राह मुश्किल

एयरलाइंस इस समय दोहरी मार झेल रही हैं—एक तरफ बढ़ती लागत और दूसरी तरफ सीमित मांग। ईंधन और लीज खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि वैश्विक तनाव यात्रा उद्योग की रिकवरी में बाधा बन रहा है। ऐसे में आने वाले समय में विमानन क्षेत्र के लिए चुनौतियां और भी बढ़ने की आशंका है।