भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ताजा मौद्रिक नीति को अर्थशास्त्री पारंपरिक नीतिगत रुख से अलग मान रहे हैं। इस बार केंद्रीय बैंक का जोर केवल महंगाई और ब्याज दरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विदेशी निवेश को आकर्षित करने और बाहरी आर्थिक चुनौतियों से निपटने पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के महीनों में रुपये पर बढ़ते दबाव और विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने की स्थिति को देखते हुए आरबीआई ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनका उद्देश्य विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाना और देश में डॉलर का प्रवाह मजबूत करना है।

नीति घोषणा के तहत विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई रियायतें और सुविधाएं दी गई हैं। इनमें विदेशी मुद्रा जमा (FCNR-B) से जुड़े नियमों में राहत, विदेशी मुद्रा ऋण (ECB) जुटाने में सहूलियत और विदेशी निवेशकों के लिए निवेश प्रक्रिया को अधिक आकर्षक बनाना शामिल है। जानकारों का मानना है कि इन कदमों से आने वाले वर्षों में अरबों डॉलर का अतिरिक्त निवेश भारत में आ सकता है।

यस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंद्रनील पान के अनुसार, इस बार आरबीआई की रणनीति भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी की कमी को दूर करने और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की चुनौतियों को संभालने पर केंद्रित दिखाई देती है। उनका मानना है कि यदि ये उपाय अपेक्षित परिणाम देते हैं तो देश के बाहरी वित्तीय मोर्चे को काफी मजबूती मिल सकती है।

केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा का कहना है कि आरबीआई ने विदेशी निवेशकों के लिए निवेश का दायरा बढ़ाने और विदेशी मुद्रा प्रवाह को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कई अहम फैसले किए हैं। उनके मुताबिक इन कदमों से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने के साथ-साथ भुगतान संतुलन की स्थिति में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि विदेशी निवेश में वृद्धि से रुपये पर दबाव कम हो सकता है। फिलहाल विदेशी निवेश की निकासी और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण भारतीय मुद्रा पर असर पड़ रहा है। ऐसे में आरबीआई और सरकार की नई पहलें रुपये को स्थिरता प्रदान करने में मददगार साबित हो सकती हैं।

जेएम फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशनल सिक्योरिटीज के अर्थशास्त्री हितेश सुवर्णा के अनुसार, केंद्रीय बैंक द्वारा घोषित अतिरिक्त उपायों का सकारात्मक असर विदेशी मुद्रा बाजार पर पड़ सकता है। उनका मानना है कि आने वाले समय में ऋण बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भागीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे भारतीय रुपये को मजबूती मिल सकती है।

अर्थशास्त्रियों का कुल मिलाकर मानना है कि आरबीआई ने इस बार केवल घरेलू आर्थिक संकेतकों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय वैश्विक परिस्थितियों और विदेशी निवेश की जरूरतों को भी अपनी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक स्थिरता और निवेश के नए अवसर मिल सकते हैं।