नई दिल्ली: मणिपुर में 2023 में हुई जातीय हिंसा से जुड़े मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम और सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों को पीड़ितों और उनके परिवारों को पूरी जानकारी देनी होगी और उन्हें अंधेरे में नहीं रखा जा सकता। इसके तहत सीबीआई और मणिपुर पुलिस की विशेष जांच टीमों को निर्देश दिया गया है कि जिन मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, उसकी प्रतियां सीधे पीड़ितों और उनके परिवारों को उपलब्ध कराई जाएं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्याय प्रक्रिया में पीड़ितों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।

जांच की स्थिति और समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश मणिपुर हिंसा मामलों की जांच की निगरानी कर रहे पूर्व महाराष्ट्र पुलिस प्रमुख दत्तात्रेय पडसलगीकर की 12वीं स्थिति रिपोर्ट देखने के बाद दिया। रिपोर्ट के अनुसार, सीबीआई ने अब तक 20 मामलों में विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की है, जबकि छह अन्य एफआईआर की जांच जारी है और इन्हें अगले छह महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एजेंसियों को बाकी मामलों की जांच निर्धारित समय में पूरी करने का निर्देश भी दिया।

पीड़ितों को मुफ्त कानूनी सहायता
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने अदालत को बताया कि कई पीड़ितों और उनके परिवारों को यह तक नहीं पता कि उनके मामलों में क्या कार्रवाई हुई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर और असम राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को आदेश दिया कि प्रत्येक पीड़ित को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की जाए। अदालत ने कहा कि ऐसे वकील नियुक्त किए जाएं जो स्थानीय भाषा समझते हों, ताकि पीड़ित आसानी से अपनी बात रख सकें। गुवाहाटी आने-जाने और ठहरने का खर्च भी मणिपुर विधिक सेवा प्राधिकरण उठाएगा।

गुवाहाटी में ट्रायल और सुविधाएँ
सुरक्षा कारणों से मणिपुर से जुड़े कई मामलों की सुनवाई असम के गुवाहाटी में स्थानांतरित कर दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल में शामिल होने के लिए पीड़ित या उनके परिवार का एक सदस्य यात्रा और ठहरने की सुविधा का लाभ ले सकता है, और इसका खर्च संबंधित प्राधिकरण वहन करेगा। कानूनी सहायता वकील जरूरत पड़ने पर सरकारी वकीलों के साथ या स्वतंत्र रूप से विशेष अदालत में मदद कर सकते हैं।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा जारी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ितों को विशेष अदालत में अपनी शिकायतें दर्ज कराने की पूरी स्वतंत्रता होगी। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पहले दिए गए आदेश के तहत पीड़ित गुवाहाटी में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बयान दर्ज करा सकते हैं। अदालत ने यह जानकर नाराजगी जताई कि पुनर्वास और जांच निगरानी समिति को अब तक कोई मानदेय नहीं मिला।

निगरानी समिति और अधिकारियों को भुगतान
अदालत ने अंतरिम व्यवस्था के तहत जस्टिस गीता मित्तल को 12 लाख रुपये और समिति की अन्य सदस्य पूर्व न्यायाधीश शालिनी पी जोशी तथा आशा मेनन को 10-10 लाख रुपये देने का आदेश दिया। साथ ही केंद्र सरकार को दत्तात्रेय पडसलगीकर को फिलहाल 10 लाख रुपये देने का निर्देश दिया गया। अदालत ने कहा कि भविष्य में मानदेय की अंतिम राशि तय की जाएगी।

मामले की अगली सुनवाई मार्च के तीसरे सप्ताह में होगी। याद रहे कि 3 मई 2023 को शुरू हुई मणिपुर हिंसा में 200 से अधिक लोगों की मौत हुई, सैकड़ों घायल हुए और हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए थे।