पटना। करीब 21 साल पहले लोकसभा सदस्य के रूप में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार अब इस पद से विदा होने वाले हैं। उनकी अगली राजनीतिक यात्रा राज्यसभा से शुरू होगी। नीतीश ने कहा है कि राज्यसभा में जाना उनकी अपनी इच्छा थी और इस दौरान वे राज्य में बनने वाली नई सरकार को हर संभव सहयोग देंगे। उनका लक्ष्य विकसित बिहार बनाने का संकल्प पूर्ववत जारी रहेगा।

स्वास्थ्य और कार्यकाल

नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा था कि वे अगले पांच वर्षों तक मुख्यमंत्री पद पर पूरी तरह से कार्यभार संभालना मुश्किल होगा। हालांकि, उन्होंने इस बदलाव की तिथि अचानक ही तय कर दी, जिससे कई राजनीतिक गलियारों में हलचल मची।

एनडीए का सम्मान

राज्यसभा जाने का निर्णय पूरी तरह नीतीश का अपना था, जिसे एनडीए के घटक दलों ने सम्मानित किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नामांकन के समय उपस्थित रहकर नीतीश के योगदान की सराहना की। हालांकि, उनके समर्थक इस फैसले को स्वीकार करने में थोड़े भावुक दिखे और कई जगह सड़क पर प्रदर्शन भी हुआ।

बिहार का “विकास पुरुष”

बिहार की जनता ने नीतीश कुमार को हमेशा विकास पुरुष के रूप में याद किया। 2005 के बाद सभी विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़े गए। 2015 में उन्होंने महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ा, और 2020 में वापस एनडीए में आने पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भाजपा की तुलना में कम सीटें मिलने पर भी नीतीश ही मुख्यमंत्री बनेंगे।

भाजपा को 74 और जदयू को 43 सीटें मिली थीं, लेकिन नीतीश को फिर भी मुख्यमंत्री बनाया गया। सत्ता-साझेदारी के संकेतों के बावजूद, नीतीश ने राज्यसभा जाने का निर्णय अपेक्षा से जल्दी पूरा कर लिया।

सभी दलों का समर्थन

नीतीश कुमार बिहार के ऐसे नेता हैं जिनके साथ किसी भी समय किसी भी दल ने राजनीति में परहेज नहीं किया। भाजपा से अलग होने और फिर एनडीए में वापस लौटने के बावजूद उन्हें सम्मान मिला। उन्होंने राजद और महागठबंधन के साथ भी सरकार बनाई और उन्हें कांग्रेस व वाम दलों का समर्थन भी मिला। आज तक राज्य में ऐसा कोई दल नहीं है जिसने नीतीश के समर्थन के बिना सरकार बनाने में हिस्सा लिया हो।