हरियाणा में इलाज कराना आम लोगों के लिए लगातार महंगा साबित हो रहा है। खास बात यह है कि जिन सरकारी अस्पतालों को सस्ते उपचार का विकल्प माना जाता है, वहां भी मरीजों को भर्ती होने पर अपनी जेब से अच्छी-खासी रकम खर्च करनी पड़ रही है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा में सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों का औसत खर्च 10,987 रुपये है। यह राष्ट्रीय औसत 6,631 रुपये से करीब 66 फीसदी अधिक है। यानी सरकारी अस्पतालों में भी इलाज देश के औसत से ज्यादा महंगा पड़ रहा है।

सरकारी अस्पतालों में क्यों बढ़ रहा खर्च?

विशेषज्ञों का कहना है कि अस्पतालों में दवाइयों, जांच सुविधाओं और जरूरी मेडिकल सामान की कमी के कारण मरीजों को बाहर से खरीदारी करनी पड़ती है। इसी वजह से कुल खर्च बढ़ जाता है।

कई मामलों में मरीजों को टेस्ट बाहर से कराने पड़ते हैं या सर्जरी के लिए जरूरी सामान खुद खरीदना पड़ता है। इससे सरकारी अस्पतालों में इलाज का खर्च भी लोगों की उम्मीद से ज्यादा हो जाता है।

निजी अस्पतालों में और ज्यादा बोझ

हरियाणा में निजी अस्पतालों में इलाज का औसत खर्च 42,359 रुपये बताया गया है। हालांकि यह राष्ट्रीय औसत 50,508 रुपये से कम है, लेकिन आम परिवारों के लिए यह रकम अब भी भारी है।

चेरिटेबल अस्पताल बने राहत का विकल्प

रिपोर्ट के मुताबिक, चेरिटेबल अस्पतालों में खर्च अपेक्षाकृत कम है। हरियाणा में ऐसे अस्पतालों में प्रति इलाज औसत खर्च 16,945 रुपये है, जबकि राष्ट्रीय औसत 39,530 रुपये है। इससे साफ है कि गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह बेहतर विकल्प बन सकते हैं।

भर्ती होने पर कुल खर्च और बढ़ जाता है

अगर अस्पताल आने-जाने, खाने-पीने और अन्य खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो हरियाणा में एक बार भर्ती होने पर कुल औसत खर्च 45,183 रुपये तक पहुंच जाता है। यह राष्ट्रीय औसत 41,463 रुपये से लगभग 3,720 रुपये ज्यादा है।

बिना भर्ती इलाज भी महंगा

ऐसी बीमारियां जिनमें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती, उनमें भी हरियाणा में खर्च ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति इलाज औसत खर्च 1,361 रुपये और शहरी इलाकों में 1,464 रुपये है। वहीं राष्ट्रीय औसत गांवों में 847 रुपये और शहरों में 884 रुपये है।

डॉक्टरों ने बताई वजह

एक समाचार पत्र से बातचीत में पीजीआई रोहतक के पूर्व सर्जन डॉ. रणबीर दहिया ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में कई बार डॉक्टर द्वारा लिखी गई पांच दवाइयों में से केवल एक या दो ही उपलब्ध होती हैं। बाकी दवाइयां मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ती हैं।

उन्होंने बताया कि हड्डी के ऑपरेशन में लगने वाले इंप्लांट जैसे सामान भी कई बार अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होते। मरीजों को इन्हें निजी दुकानों से खरीदना पड़ता है, जिससे खर्च बढ़ जाता है।

आईएमए के पूर्व प्रधान डॉ. अजय महाजन का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में दवाइयों और सर्जिकल सामान की कमी एक बड़ी समस्या है। मरीजों का सबसे ज्यादा पैसा दवाइयों पर ही खर्च होता है।

सुधार की जरूरत

ये आंकड़े संकेत देते हैं कि हरियाणा में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को और सस्ता तथा सुलभ बनाने की जरूरत है। यदि अस्पतालों में दवाइयां, जांच और जरूरी संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों, तो मरीजों पर आर्थिक बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है।