विभिन्न जातियों में सामाजिक संगठन समय-समय पर अपने समाज में एकता स्थापित करने की बात तो करते हैं, परन्तु कोई भी जाति-समाज में पनप रही गंदी आदतों एवं पुरानी कुरीतियों को मिटाने की बात नहीं करता। बहुत से संगठन तो ऐसे हैं कि उनकी स्थापना करने वाले थोड़ा प्रचार-प्रसार होते ही राजनीतिक दलों में घुसकर अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति कर लेते हैं, और कुछ हताश-निराश होकर कुछ समय बाद सब कुछ छोड़कर घर बैठ जाते हैं।

परन्तु चंद ऐसे लोग भी हैं जो आहिस्ता-आहिस्ता अपनी राह पर चलते रहते हैं, परन्तु समाज में पनप रही शराब और नशीली दवाओं के संबंध में कुछ भी नहीं कह पाते। पुरानी घिसी-पिटी परंपराओं का विरोध भी नहीं कर पाते, जिस कारण युवा पीढ़ी दिन-प्रतिदिन गलत रास्ते पर चल रही है।

नशे के अतिरिक्त विवाह-शादी में आडंबर व फिजूलखर्ची को लोग बढ़ावा दे रहे हैं। मृत्यु उपरांत मृत्यु-भोज को भी जश्न के रूप में मनाया जाने लगा है। रस्म तेरहवीं पर घंटों-घंटों तक भाषणबाजी के साथ हंसी-मजाक करते हुए लोगों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि किसी के जाने का अफसोस है।

आजकल तो श्मशान घाट पर भी लोग शांत नहीं रहते, धूम्रपान करते रहते हैं और हंस-हंसकर बात करते हैं। गंभीरता कहीं दिखाई नहीं देती। पाश्चात्य संस्कृति की अंधी दौड़ में रिश्ते-नाते सब समाप्त हो रहे हैं।

पद और पैसे की अत्यधिक लालसा में रिश्तों का खून करने में इंसान को तनिक भी हिचकिचाहट नहीं होती। मां-बाप का सम्मान तो बहुत कम बच्चे करते हैं, और जिस घर में अभी भी मां-बाप का सम्मान हो रहा हो, तो समझो वह बहुत भाग्यशाली है।

लोग एक-दूसरे के पास अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए बैठते हैं। इसलिए अभी भी समय है—आने वाली पीढ़ी पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

प्रस्तुति: उमादत्त शर्मा
लेखक, समाजसेवी एवं वरिष्ठ नागरिक, जनपद मुजफ्फरनगर