दिल्ली में कार क्लोनिंग गैंग का खुलासा: चोरी की गाड़ियां बनाईं ‘असली’, ऑनलाइन बेचते थे ठग

दिल्ली: राजधानी में पुराने तरीके की वाहन चोरी में नई तकनीक जोड़कर काम करने वाले एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। क्राइम ब्रांच की जांच में सामने आया है कि आरोपी चोरी की कारों को क्लोन कर असली मालूम होने वाले दस्तावेज बनाकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और स्थानीय डीलरों के माध्यम से बेचा करते थे।
मामला तब उजागर हुआ जब एक प्रतिष्ठित सेकंड-हैंड कार बिक्री कंपनी ने अपनी साइट पर संदिग्ध लेन-देन की रिपोर्ट दर्ज कराई। कंपनी के आंतरिक ऑडिट ने संकेत दिए कि कुछ वाहनों के दस्तावेज़ असल दिखने के बावजूद मेल नहीं खा रहे थे। जांच के दौरान यह बात भी पता चली कि गिरोह ने कम से कम तीन गाड़ियाँ कंपनी के रिठाला सेंटर पर और दो अन्य वाहन साझेदार डीलरों को बेची थीं।
जांचू अधिकारियों के अनुसार गिरोह का संचालन कई राज्यों में फैला हुआ था और उनका तरीका बेहद व्यवस्थित था। पहली कड़ी में वे किसी वाहन की चोरी करते, फिर उसी मॉडल-वेरिएंट वाली वैध गाड़ी की पहचान (चेसिस, रंग, रजिस्ट्रेशन डिटेल) हासिल कर लेते। फिर चोरी गई गाड़ी पर वैसी ही चेसिस-प्लेट लगाकर नंबर बदल दिए जाते और नकली आरसी, आधार-पैन व यहां तक कि फाइनेंस संस्थाओं की झूठी एनओसी तैयार कर ली जाती।
कंपनी के अधिकारियों ने भी बताया कि बनाए गए कागजात इतने बारीकी से तैयार किए गए थे कि सरकारी पोर्टलों पर सामान्य वेरिफिकेशन में वे वास्तविक प्रतीत होते थे। इसी कारण साधारण जांच के दौरान भी धोखाधड़ी पकड़ पाना कठिन हो रहा था।
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि खरीद-बिक्री के लिए खोले गए बैंक खातों की पहचान भी फर्जी दस्तावेजों से बनाई गई थी। शुरुआती सुराग बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत की ओर इशारा करते हैं; इस पहलू की गंभीरता से स्वतः जाँच की जा रही है।
पुलिस का कहना है कि गिरोह कई बार वाहन को एक जगह पर बेचने में असफल होने पर उसे दूसरे शहर या किसी अन्य डीलर के जरिए बाजार में उतार देता था। स्पष्ट रूप से देखा गया कि लोन-लाइन कारों के मामले में नकली एनओसी बनाकर यह दिखाया जाता था कि ऋण चुका दिया गया है, ताकि खरीदारों और डीलरों को धोखा दिया जा सके।
आरोपियों के बनाए दस्तावेजों में सरकारी विभागों की दिखने वाली मुहरें और हस्ताक्षर भी शामिल थे, जिससे यह सिद्ध होता है कि काम पेशेवर स्तर पर किया जा रहा था। पकड़े जाने के भय से आरोपित अक्सर हर लेन-देन के बाद मोबाइल नंबर बदल देते या सिम बंद कर देते थे, जिससे ट्रेस करना और भी कठिन हो जाता था।
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने चोरी, धोखाधड़ी, जालसाजी व आपराधिक साजिश के तहत एफआईआर दर्ज कर विशेष जांच टीम गठित कर दी है। टीम गिरोह के नेटवर्क, फाइनेंसर, और संभावित सहयोगियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से भी खरीदारों और डीलरों से सावधानी बरतने की अपील की है — वाहन लेते समय आरसी-वेरिफिकेशन, चेसिस नंबर की पुख्ता जाँच और बैंक एनओसी-संबंधी दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि कराई जाए।
क्राइम ब्रांच ने बताया कि जारी जांच में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं तथा जिन डीलरों और प्लेटफॉर्म पर संदिग्ध ट्रांजैक्शन सामने आए हैं, उनके रिकॉर्ड भी बारीकी से खंगाले जा रहे हैं। पुलिस ने लोगों से आग्रह किया है कि यदि किसी को भी संदिग्ध वाहन या दस्तावेजों के संबंध में जानकारी हो तो तुरंत नजदीकी थाने या क्राइम ब्रांच को सूचित करें।
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