‘हाइब्रिड मॉडल’ से चल रहा है पाकिस्तान, ख्वाजा आसिफ ने स्वीकारा सेना का दखल

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में माना है कि देश की शासन व्यवस्था पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं है, बल्कि यहां सेना और नागरिक सरकार मिलकर फैसले लेती है। एक पत्रकार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना को ‘हाइब्रिड मॉडल’ कहा जा सकता है।
जब उनसे पूछा गया कि सेना प्रमुख का प्रभाव इतना ज्यादा क्यों है, तो आसिफ ने जवाब दिया—“हमारी व्यवस्था अलग है। फैसले सहमति से होते हैं। कभी मतभेद भी होते हैं, लेकिन आखिरकार सामूहिक निर्णय ही मान्य होता है।” उन्होंने अमेरिकी सिस्टम की तुलना पर कहा कि पाकिस्तान का मॉडल अलग है और अमेरिका की व्यवस्था को उन्होंने “डीप स्टेट” करार दिया।
आसिफ पहले भी इस व्यवस्था को मौजूदा हालात में ‘जरूरी और व्यावहारिक’ बता चुके हैं। उनके अनुसार, पाकिस्तान की आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों से निपटने के लिए यही ढांचा सबसे उपयुक्त है।
चीन पर भरोसा, अमेरिका से रिश्तों पर सफाई
अमेरिका और पाकिस्तान की हाल की नज़दीकियों को लेकर भी उनसे सवाल हुआ। हाल ही में वॉशिंगटन में प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की थी। इस पर आसिफ ने कहा कि चीन को इससे कोई आपत्ति नहीं है।
उन्होंने कहा, “हमारा चीन के साथ दशकों पुराना भरोसेमंद रिश्ता है। पाकिस्तान की वायुसेना से लेकर नौसेना तक का बड़ा हिस्सा चीन से मिले हथियारों पर निर्भर है। अमेरिका की अनिश्चित नीतियों के कारण पाकिस्तान का झुकाव और भी ज्यादा चीन की ओर हुआ है।”
सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता
साक्षात्कार में आसिफ ने सऊदी अरब के साथ हाल ही में हुए रक्षा समझौते का भी ज़िक्र किया। इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे दोनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, उन्होंने इस सवाल पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया कि क्या पाकिस्तान की परमाणु सुरक्षा छत्रछाया सऊदी अरब तक फैलेगी।
यूएनजीए में ट्रंप की तारीफ
इसी बीच प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन का बड़ा हिस्सा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ को समर्पित किया। उन्होंने ट्रंप को “शांति का दूत” बताते हुए यहां तक कहा कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया जाना चाहिए।
हालांकि भारत ने इस दावे को खारिज किया और कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ युद्धविराम समझौता दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच सीधी बातचीत से तय हुआ था, इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं थी।
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