पाकिस्तान: बलूचिस्तान की ‘शेरनी’ महरंग बलोच को मिली आजीवन कारावास की सजा

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लापता लोगों के अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहीं डॉक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को आतंकवाद-रोधी अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। कभी एक मेडिकल प्रोफेशनल रहीं महरंग, बाद में अपने पिता के कथित अपहरण और हत्या के बाद मानवाधिकार आंदोलन की प्रमुख आवाज बन गई थीं।
अदालत ने उनके साथी एक्टिविस्ट सिबगतुल्लाह शाह को भी आजीवन कारावास की सजा दी है। दोनों पर 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक अर्धसैनिक जवान की मौत से जुड़े मामले में आतंकवाद, देशद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप तय किए गए थे। हालांकि महरंग ने हमेशा इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है और फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील की तैयारी की जा रही है।
बचपन का दर्द बना आंदोलन की वजह
महरंग बलोच का जीवन 2009 में उस समय बदल गया, जब उनके पिता अब्दुल गफ्फार लैंगोव अचानक लापता हो गए। उस वक्त वह मात्र 16 साल की थीं। कुछ साल बाद परिवार को उनके शव की जानकारी मिली, जिसे लेकर महरंग ने गंभीर प्रताड़ना के आरोप लगाए थे।
इसके बाद उन्होंने बलूचिस्तान में लापता लोगों के मुद्दे को लेकर बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू किया और “बलूच यकजेहती समिति” (BYC) से जुड़कर मानवाधिकार संघर्ष की पहचान बन गईं।
गिरफ्तारी और गंभीर आरोप
रिपोर्ट्स के अनुसार, मार्च 2025 में क्वेटा में एक प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप है कि वे एक ऐसे विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही थीं, जो अज्ञात शवों के दफन को लेकर शुरू हुआ था।
जांच एजेंसियों का दावा है कि महरंग और उनके सहयोगी प्रतिबंधित गतिविधियों से जुड़े हो सकते हैं, हालांकि उनके समर्थन में मानवाधिकार संगठनों ने इन आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।
“लापता लोगों” का विवादित मुद्दा
बलूचिस्तान में दशकों से “लापता लोगों” का मुद्दा बेहद संवेदनशील रहा है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि हजारों लोग बिना कानूनी प्रक्रिया के गायब किए गए, जबकि पाकिस्तान सरकार का कहना है कि इनमें से कई लोग या तो विद्रोही गुटों में शामिल हो गए या देश छोड़ चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और विवाद
महरंग बलोच को उनके आंदोलन के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान भी मिली थी और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया था। उन्हें बलूचिस्तान में “शेरनी” के नाम से भी जाना जाता है।
फिलहाल, उम्रकैद की सजा ने उनके आंदोलन को बड़ा झटका दिया है, जबकि उनके समर्थक इसे असहमति की आवाज दबाने की कोशिश बता रहे हैं।
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