सुप्रीम कोर्ट ने 1984 के एक पुराने चर्चित डबल मर्डर और ट्रक लूट मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी गोपी चंद की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि मामले में बहुत लंबा समय बीत चुका है और आरोपी पहले ही 18 साल से अधिक की जेल सजा काट चुका है। इसी को ध्यान में रखते हुए शीर्ष अदालत ने उसकी सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित करते हुए उसकी तत्काल रिहाई के आदेश दिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि गोपी चंद किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत जेल से रिहा किया जाए।

1984 में क्या हुआ था यह मामला?

यह घटना जुलाई 1984 की है, जब आरोप है कि गोपी चंद, उसके भाई और कुछ अन्य लोगों ने मिलकर एक ट्रक लूटने की योजना बनाई थी। इसके लिए उन्होंने सीताफल ले जाने के बहाने ट्रक किराए पर लिया था। रास्ते में चालक और क्लीनर की हत्या कर दी गई और उनके शव दिल्ली के अलीपुर और सिविल लाइंस क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर फेंक दिए गए। इसके बाद आरोपी ट्रक लेकर फरार हो गए थे। इस मामले में कुल पांच लोग गिरफ्तार हुए थे, जिनमें से एक ने बाद में सरकारी गवाह के रूप में बयान दिया।

अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को क्यों खारिज किया?

सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से दलील दी गई कि सरकारी गवाह का बयान भरोसेमंद नहीं है और उसने खुद को बचाने के लिए अन्य आरोपियों को फंसाया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि गवाह ने स्वयं अपराध में अपनी भूमिका स्वीकार की थी और उसने यह भी माना था कि वह ट्रक लूटने की योजना में शामिल था। केवल इस आधार पर उसकी गवाही को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि उसने अंतिम वार नहीं किया।

हत्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने माना कि ट्रक लूटने की साजिश पहले से तैयार की गई थी और इसमें हिंसा की संभावना स्पष्ट थी। कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित किया जाता है, तो बल प्रयोग की आशंका रहती है।

अदालत ने यह भी कहा कि यह हत्या अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि पूरी तरह योजनाबद्ध अपराध का हिस्सा थी। गोपी चंद की अपने भाई और अन्य आरोपियों के साथ सक्रिय भूमिका साबित होती है और इसके पर्याप्त सबूत रिकॉर्ड में मौजूद हैं।

फॉरेंसिक और अन्य सबूतों की भूमिका

कोर्ट ने यह भी माना कि सरकारी गवाह के बयान को फॉरेंसिक साक्ष्यों और जांच रिपोर्टों से समर्थन मिला है। जांच के दौरान सिविल लाइंस क्षेत्र से एक शव बरामद हुआ था, जिससे मामले की गंभीरता और आरोपों की पुष्टि हुई।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा किए गए सबूतों के मूल्यांकन को भी सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया।

सजा में राहत क्यों मिली?

हालांकि दोष सिद्धि बरकरार रखी गई, लेकिन अदालत ने मानवीय आधार पर राहत प्रदान की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना को चार दशक से अधिक समय बीत चुका है और आरोपी पहले ही लंबी अवधि की सजा काट चुका है।

साथ ही, इसी मामले के अन्य दोषियों को भी पहले ही सजा में छूट मिल चुकी है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने गोपी चंद की सजा को पहले से बिताई गई जेल अवधि तक सीमित कर दिया और उसकी रिहाई का आदेश दिया।