बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में कहा है कि केवल वैवाहिक मतभेदों के आधार पर किसी व्यक्ति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़े और घरेलू तनाव को सीधे तौर पर आत्महत्या से जोड़ना न्यायसंगत नहीं है। इसी टिप्पणी के साथ नागपुर बेंच ने एक 49 वर्षीय महिला के खिलाफ दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला रद्द कर दिया। यह मामला वर्ष 2019 में अमरावती पुलिस ने दर्ज किया था।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी तभी माना जा सकता है, जब यह साबित हो कि आरोपी ने सीधे तौर पर पीड़ित को ऐसा कदम उठाने के लिए प्रेरित किया या उसे इसके लिए उकसाया। केवल पति-पत्नी के बीच विवाद, आरोप-प्रत्यारोप या आपसी तनाव को इस अपराध का आधार नहीं बनाया जा सकता।

न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामले में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे। अदालत के अनुसार, ऐसी परिस्थितियां मानसिक तनाव का कारण बन सकती हैं, लेकिन इन्हें आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष उकसावा नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में ‘मेंस रिया’ यानी अपराध करने की स्पष्ट मंशा का होना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति के इरादे या जानकारी के बिना घटना हुई है, तो उसे उकसावे का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि गुस्से में कही गई सामान्य बातें इस अपराध की श्रेणी में नहीं आतीं।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि मृतक द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट में किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि इससे महिला की सीधी भूमिका साबित नहीं होती।

मामले के अनुसार, दोनों की शादी वर्ष 1996 में हुई थी और समय के साथ उनके बीच विवाद बढ़ते चले गए। पति के परिवार ने महिला पर प्रताड़ना के आरोप लगाए थे, जबकि महिला ने भी अपने साथ हिंसा और दुर्व्यवहार होने का दावा किया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि यह मूल रूप से वैवाहिक विवाद का मामला है और इसे आपराधिक उकसावे के रूप में नहीं माना जा सकता।