पटना। जब न्यायिक प्रक्रिया राजनीति के केंद्र में दस्तक देती है, तो उसके असर सिर्फ़ अदालत तक सीमित नहीं रहते। राष्ट्रीय जनता दल इस समय उसी दौर से गुजर रहा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत के हालिया आदेश ने न केवल लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की कानूनी मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसने दशकों तक बिहार की राजनीति की दिशा तय की।
‘जमीन के बदले नौकरी’ मामले में आरोप तय होने के साथ ही राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और मीसा भारती सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराओं में मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला कानूनी रूप से अहम है, लेकिन इससे भी ज़्यादा चर्चा उस राजनीतिक हलचल की है, जो इसके बाद पार्टी और परिवार के भीतर दिखाई दे रही है।
बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही यादव परिवार के भीतर असंतोष की सुगबुगाहट थी। अब यह असंतोष खुलकर सामने आया है। लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट ने राजद की अंदरूनी राजनीति को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।
रोहिणी ने बिना किसी का नाम लिए ऐसे लोगों पर निशाना साधा, जिन्हें वह ‘अपने’ बताती हैं और जो कथित तौर पर पार्टी की स्थापित विरासत को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने लिखा कि किसी बड़ी विरासत को नष्ट करने के लिए बाहरी दुश्मनों की ज़रूरत नहीं होती, कई बार नए-नए बने अपने ही इसके लिए काफ़ी होते हैं। उनकी बातों में राजनीतिक कटाक्ष के साथ-साथ पारिवारिक पीड़ा भी साफ़ झलकती है।
उनके बयान को राजद के भीतर तेजस्वी यादव के करीबी माने जाने वाले रणनीतिकार संजय यादव और पार्टी के सोशल मीडिया प्रबंधन से जुड़े रमीज नेमत से जोड़कर देखा जा रहा है। संजय यादव को तेजस्वी की राजनीति का अहम सूत्रधार माना जाता है, जबकि रमीज नेमत का नाम पहले भी डिजिटल रणनीति को लेकर विवादों में आ चुका है।
रोहिणी के संकेतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब पार्टी की दिशा और फैसले परिवार के बजाय बाहरी सलाहकार तय कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब लालू परिवार में ‘अंदरूनी साज़िश’ की बात सामने आई हो। इससे पहले तेज प्रताप यादव भी ‘जयचंद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर अपनों पर सवाल उठा चुके हैं।
इस बार फर्क इतना है कि मामला सिर्फ़ रणनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नेतृत्व और राजनीतिक विरासत तक पहुंच गया है। राजद की पहचान लंबे समय से लालू प्रसाद यादव की छवि, सामाजिक न्याय की राजनीति और यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिकी रही है। लेकिन अदालत के फैसले और परिवार के भीतर उभरते मतभेद यह संकेत दे रहे हैं कि पार्टी के लिए आने वाला समय केवल कानूनी लड़ाई का नहीं, बल्कि संगठन और नेतृत्व के पुनर्संतुलन का भी हो सकता है।
राउज एवेन्यू कोर्ट में चल रही सुनवाई अब सिर्फ़ एक आपराधिक मुकदमा नहीं रह गई है। यह संघर्ष अब सियासी भरोसे, नियंत्रण और विरासत की परीक्षा बन चुका है। सवाल यही है कि क्या राजद और लालू परिवार इस आंतरिक टकराव को संभाल पाएंगे, या फिर पार्टी के भीतर भी एक बड़ा राजनीतिक बदलाव दस्तक देने वाला है।