दिल्ली: उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में दिल्ली मेट्रो में राजनीतिक विज्ञापनों पर लगाए गए प्रतिबंध को सही ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के तहत आदर्श आचार संहिता लागू होने के दौरान इस तरह के विज्ञापनों पर रोक वैध है और यह नियम कानून के दायरे में आता है।

न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह प्रतिबंध अस्थायी प्रकृति का है और इसे व्यवसाय करने के अधिकार पर पूर्ण रोक नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यह रोक संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करती।

यह फैसला दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) में विज्ञापन अधिकार रखने वाली कंपनियों की याचिका पर आया है। इन कंपनियों के पास मेट्रो ट्रेनों के अंदर और बाहर तथा अन्य सार्वजनिक संरचनाओं पर विज्ञापन लगाने के अधिकार हैं।

अदालत ने अपने तर्क में कहा कि राजनीतिक विज्ञापनों पर रोक केवल चुनाव प्रक्रिया के दौरान लागू होती है और इसका उद्देश्य निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना है। यह किसी भी तरह से सभी व्यापारिक गतिविधियों पर रोक नहीं लगाता, बल्कि केवल एक विशेष श्रेणी के विज्ञापनों को नियंत्रित करता है।

वहीं याचिकाकर्ता कंपनियों ने इस प्रतिबंध को चुनौती देते हुए कहा था कि इससे उनके व्यावसायिक हित प्रभावित होते हैं और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है। हालांकि अदालत ने इन सभी दलीलों को अस्वीकार कर दिया और चुनाव आयोग के नियमों को बरकरार रखा।