भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग 2025 में अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है। इस साल अब तक ईवी की बिक्री 1.76 लाख यूनिट से अधिक हो गई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 77 प्रतिशत की मजबूत बढ़त दर्शाती है। इस तेजी को देखते हुए इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों और उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों की नजरें आने वाले केंद्रीय बजट पर टिकी हुई हैं।
तेज बढ़ोतरी के बीच सरकारी सहयोग जरूरी
उद्योग का मानना है कि ईवी को लेकर बाजार में बनी सकारात्मक रफ्तार को बनाए रखने के लिए सरकार का समर्थन जारी रहना बेहद जरूरी है। कंपनियां चाहती हैं कि सब्सिडी योजनाएं आगे भी चलती रहें, सप्लाई चेन की लागत को संतुलित करने में मदद मिले और चार्जिंग नेटवर्क के विस्तार पर बड़ा निवेश किया जाए। इससे पेट्रोल और डीजल वाहनों से इलेक्ट्रिक कारों की ओर बदलाव को गति मिलेगी।
एंट्री-लेवल ईवी अब भी महंगी
विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती सेगमेंट में ईवी की कीमतें आम ग्राहकों के लिए अब भी चुनौती बनी हुई हैं। यदि नीतिगत स्तर पर सहायता मिले तो ईवी को ज्यादा किफायती बनाया जा सकता है, जिससे उनकी पहुंच बड़े वर्ग तक हो सकेगी।
ईवी कंपोनेंट बनाने वाली कंपनी इंगार इलेक्ट्रॉनिक्स की निदेशक रचना आहूजा के मुताबिक, उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने के लिए मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने वाली योजनाएं अहम हैं। उन्होंने कहा कि कम ब्याज पर लोन, टैक्स में राहत और औद्योगिक जमीन की उपलब्धता जैसे कदम निवेशकों को आकर्षित कर सकते हैं।
चार्जिंग नेटवर्क अभी भी बड़ी चुनौती
चार्जिंग सुविधाओं की कमी ईवी सेक्टर के सामने अब भी एक बड़ी रुकावट है। रचना आहूजा का कहना है कि रास्ते में चार्जिंग स्टेशन न मिलने और बैटरी खत्म होने के डर यानी ‘रेंज एंग्जायटी’ के कारण कई ग्राहक ईवी खरीदने से हिचकते हैं। यही वजह है कि फिलहाल ईवी का उपयोग बड़े शहरों तक सीमित नजर आता है।
सरकारी योजनाओं से मिला है सहारा
केंद्र सरकार पहले ही FAME-II, पीएम ई-ड्राइव, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और पीएम ई-बस सेवा जैसी योजनाएं लागू कर चुकी है। इनका उद्देश्य ईवी को बढ़ावा देना, निवेश को आकर्षित करना और घरेलू स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है। उद्योग को उम्मीद है कि बजट में इन योजनाओं को और विस्तार मिलेगा।
ग्रीन फाइनेंस से जुड़े मर्चेंट बैंकर अविजित भट्ट के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव सब्सिडी को फ्लीट ऑपरेटर्स तक बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे हरित परिवहन को और बल मिल सके।
कच्चे माल की कीमतें बढ़ा रहीं दबाव
उद्योग का कहना है कि वैश्विक बाजार में तांबे और अन्य जरूरी कच्चे माल की कीमतों में तेजी से निर्माण लागत बढ़ रही है। हालांकि इन बाहरी कारणों पर नियंत्रण संभव नहीं, लेकिन सब्सिडी और प्रोत्साहन योजनाएं इनके असर को कम कर सकती हैं, जिससे ईवी आम मध्यम वर्ग की पहुंच में बने रहें।
तीन-पहिया सेगमेंट सबसे आगे
फिलहाल देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की सबसे बड़ी हिस्सेदारी तीन-पहिया सेगमेंट में देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बेहतर फाइनेंसिंग, आकर्षक छूट और सरकारी सहयोग मिलता रहा, तो एंट्री-लेवल कारों से लेकर एसयूवी और प्रीमियम सेगमेंट तक ईवी की मांग तेजी से बढ़ सकती है।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर बढ़ रहा जोर
सरकारी अधिकारियों के अनुसार अब केंद्र सरकार का विशेष फोकस सार्वजनिक परिवहन के विद्युतीकरण पर है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसका लाभ मिल सके। दिल्ली में FAME योजना के तहत परिवहन निगम के बेड़े में बड़ी संख्या में इलेक्ट्रिक बसें शामिल की गई हैं। साथ ही मेट्रो स्टेशनों तक आखिरी मील कनेक्टिविटी के लिए DEVi जैसी छोटी इलेक्ट्रिक बसें भी चलाई जा रही हैं।
2030 के लक्ष्य बरकरार
सरकार 2030 तक निजी कारों में करीब 30 प्रतिशत, दो-पहिया और तीन-पहिया में 80 प्रतिशत तथा कमर्शियल वाहनों में 70 प्रतिशत ईवी हिस्सेदारी का लक्ष्य बनाए हुए है। आने वाले बजट से मिलने वाला समर्थन इन लक्ष्यों को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकता है।