मुजफ्फरनगर: ईंट भट्ठा मजदूरों का 22 किमी पैदल मार्च, कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन

मुजफ्फरनगर। भीषण गर्मी और तेज धूप के बावजूद जिले के ईंट भट्ठा मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर सोमवार को जोरदार प्रदर्शन किया। शाहपुर क्षेत्र से बड़ी संख्या में मजदूर महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा करीब 22 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर जिला मुख्यालय पहुंचे और प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।
तपती सड़कों पर घंटों पैदल चलने के बाद कलेक्ट्रेट पहुंचे श्रमिकों ने अपनी समस्याओं को उठाते हुए श्रम कानूनों के प्रभावी पालन और बेहतर सुविधाओं की मांग की।

न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलने का आरोप
प्रदर्शन में शामिल मजदूरों का कहना था कि सरकार द्वारा ईंट भट्ठा श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम दैनिक मजदूरी 718.35 रुपये तय की गई है, लेकिन कई स्थानों पर इसका पालन नहीं किया जा रहा। उनका आरोप है कि उन्हें निर्धारित दर से कम भुगतान किया जाता है, जबकि काम की प्रकृति बेहद कठिन और श्रमसाध्य होती है।
मूलभूत सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया
श्रमिकों ने कहा कि मजदूरी के अलावा आवास, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, स्वास्थ्य सेवाएं और बच्चों की शिक्षा जैसी आवश्यक सुविधाएं भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। उनका दावा है कि कई श्रमिक परिवार आज भी बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवनयापन और काम करने को मजबूर हैं।
नारेबाजी के साथ निकाला मार्च
हाथों में झंडे और बैनर लिए श्रमिकों ने शाहपुर से शुरू हुए मार्च के दौरान अपने अधिकारों के समर्थन में नारे लगाए। यह पैदल मार्च शहर के विभिन्न मार्गों और शिव चौक से होकर कलेक्ट्रेट पहुंचा, जहां प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।
ज्ञापन में रखीं प्रमुख मांगें
श्रमिकों ने ज्ञापन के माध्यम से मांग की कि ईंट भट्ठों पर निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का सख्ती से पालन कराया जाए। इसके साथ ही श्रमिक परिवारों के लिए सुरक्षित आवास, स्वच्छ पेयजल, चिकित्सा सुविधाएं, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं।

उन्होंने यह भी मांग उठाई कि श्रम कानूनों की अनदेखी करने वाले भट्ठा संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि उनकी मांगों पर जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों की जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
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