रांची अस्पताल विवाद: मरीज की मौत पर जांच के लिए 4 सदस्यीय टीम गठित

HIGHLIGHTS
- रांची के एक निजी अस्पताल में मरीज की मौत के बाद लगे आरोपों की जांच के लिए जिला प्रशासन ने 4 सदस्यीय टीम गठित की है।
- परिजनों ने इलाज में लापरवाही और भारी-भरकम बिलिंग का आरोप लगाया है, जबकि अस्पताल ने आरोपों को खारिज किया है।
- जांच टीम मेडिकल रिकॉर्ड, इलाज प्रक्रिया और परिजनों के आरोपों की समीक्षा कर रिपोर्ट उपायुक्त को सौंपेगी।
रांची के मेन रोड स्थित एक निजी अस्पताल में मरीज की मौत के बाद उपजे विवाद और परिजनों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच के लिए जिला प्रशासन ने चार सदस्यीय जांच टीम का गठन किया है। मुख्यमंत्री द्वारा मामले का संज्ञान लेने के बाद उपायुक्त ने तत्काल जांच के निर्देश दिए थे।
इसके तहत सिविल सर्जन कार्यालय ने दो चिकित्सकों डॉ. एस. अली और डॉ. राजीव रंजन को जांच दल में शामिल किया है, जबकि जिला प्रशासन की ओर से दो अन्य अधिकारियों को भी टीम में जोड़ा गया है। सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि जांच टीम ने शनिवार से मामले की विस्तृत पड़ताल शुरू कर दी है।
टीम अस्पताल में मरीज के इलाज से जुड़े सभी दस्तावेज, मेडिकल प्रक्रिया, प्रबंधन की भूमिका और परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों की बारीकी से जांच करेगी। रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे सीधे उपायुक्त को सौंपा जाएगा, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
इलाज और बिल को लेकर विवाद
दो दिन पहले मरीज की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया था। उनका कहना है कि इलाज के दौरान मरीज के पैर में संक्रमण बढ़ गया था, जबकि अस्पताल की ओर से करीब 18 लाख रुपये का बिल थमा दिया गया।
परिजनों के अनुसार, इसमें से लगभग 10 लाख रुपये बीमा के जरिए अस्पताल को मिल चुके थे, जबकि शेष राशि का आंशिक भुगतान किया गया, लेकिन अब भी करीब 2.5 लाख रुपये बकाया बताए जा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर अस्पताल परिसर में हंगामा भी हुआ था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को जांच और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
अस्पताल प्रबंधन का पक्ष
वहीं अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि मरीज राजू कुमार रंजन को 24 मई को गंभीर हालत में भर्ती कराया गया था। उसे सिर में चोट, रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर और दोनों फेफड़ों में गंभीर क्षति थी।
अस्पताल के अनुसार, इलाज के दौरान चार दिनों तक मरीज के परिजनों को पैर के संक्रमण को रोकने के लिए एम्प्यूटेशन की सलाह दी गई, लेकिन परिजन इसके लिए सहमत नहीं हुए। प्रबंधन ने यह भी दावा किया कि जांच टीम के समक्ष सभी रिकॉर्ड और दस्तावेज उपलब्ध करा दिए गए हैं।
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