नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और किसानों को महंगाई से बचाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने रबी 2025-26 सीजन के लिए उर्वरक सब्सिडी में बढ़ोतरी का ऐलान किया है। इस बार सरकार ने 37,952 करोड़ रुपये की अनुमानित उर्वरक आवश्यकता तय की है, जो खरीफ 2025 के मुकाबले लगभग 736 करोड़ रुपये अधिक है। यह कदम न केवल बुवाई के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा, बल्कि मिट्टी के पोषण संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक साबित होगा।

डीएपी पर सबसे ज्यादा बढ़ोतरी
सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरक और कच्चे माल की अस्थिर कीमतों को देखते हुए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत सब्सिडी दरों में बदलाव किया है। खासतौर पर डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की सब्सिडी में बड़ा इजाफा हुआ है। पिछले वर्ष यह 21,911 रुपये प्रति टन थी, जिसे बढ़ाकर 29,805 रुपये प्रति टन कर दिया गया है। इसका लाभ मुख्य रूप से गेहूं, तिलहन और दालों की खेती करने वाले किसानों को मिलेगा, क्योंकि रबी सीजन इन फसलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है।

एनबीएस योजना: संतुलित उर्वरक उपयोग की दिशा में बड़ा कदम
एनबीएस योजना, जो 1 अप्रैल 2010 से लागू है, उर्वरक सब्सिडी में एक बड़ा बदलाव लेकर आई। पुरानी व्यवस्था में यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल को बढ़ावा मिलता था, जबकि एनबीएस योजना उर्वरकों में नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K) और सल्फर (S) की मात्रा के आधार पर सब्सिडी तय करती है। इसका उद्देश्य किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग की ओर प्रेरित करना है।

एनबीएस योजना से माइक्रोन्यूट्रिएंट्स यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग को बढ़ावा मिला है, जिससे मृदा क्षरण और पोषक तत्वों के असंतुलन की समस्या कम हुई है। वर्षों तक नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल ने मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित किया और उपज बढ़ाने की क्षमता सीमित कर दी थी।

उत्पादकता और आत्मनिर्भरता पर असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एनबीएस योजना लागू होने के बाद देश में खाद्यान्न उत्पादकता 2010-11 के 1,930 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2024-25 में 2,578 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। इसके साथ ही घरेलू फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरक उत्पादन में भी 2014 के बाद 50% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है।

सब्सिडी खर्च और दीर्घकालिक रणनीति
केंद्र सरकार ने 2022-23 से 2024-25 तक NBS सब्सिडी पर 2.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं। आलोचक इसे राजकोषीय स्थायित्व के लिए चुनौती बताते हैं, लेकिन समर्थकों का कहना है कि उच्च पैदावार, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और कम आयात निर्भरता इसे सही ठहराते हैं। रबी सीजन के लिए बढ़ी सब्सिडी किसानों को वैश्विक महंगाई से राहत देगी और भारतीय कृषि को वैज्ञानिक और संतुलित खेती की दिशा में आगे ले जाने की सरकार की रणनीति का हिस्सा है।