कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मध्य पूर्व में तेज होते तनाव को वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था की कमजोरी का संकेत बताया है। उनका कहना है कि कई दशक की कूटनीति, आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर प्रभावी रोक नहीं लगाई जा सकी है।
सिडनी यात्रा के दौरान पत्रकारों से बातचीत में कार्नी ने कहा कि मौजूदा हालात यह दर्शाते हैं कि वैश्विक संस्थान लंबे समय तक चली वार्ताओं और दबाव की रणनीति के बावजूद अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर पाए। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि यह संकट अंतरराष्ट्रीय तंत्र की सीमाओं को उजागर करता है।
ईरान का परमाणु मुद्दा अब भी चिंता का कारण
प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी, विभिन्न चरणों में लगाए गए प्रतिबंधों और कूटनीतिक पहलों के बावजूद ईरान का परमाणु कार्यक्रम वैश्विक समुदाय के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
कार्नी ने दोहराया कि कनाडा लंबे समय से ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता का एक प्रमुख कारक मानता रहा है। उनके अनुसार, ईरानी शासन और उससे जुड़े समूहों की गतिविधियों ने क्षेत्र में हिंसा और असुरक्षा को बढ़ाया है, जिसमें कई निर्दोष लोग, यहां तक कि कनाडाई नागरिक भी, अपनी जान गंवा चुके हैं।
अमेरिका-इजरायल की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री ने कहा कि कनाडा उन सभी प्रयासों का समर्थन करता है, जिनका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाली किसी भी गतिविधि का विरोध किया जाना चाहिए।
हालांकि, कार्नी ने हालिया घटनाओं को लेकर चिंता व्यक्त की कि अमेरिका और इजरायल द्वारा की गई कार्रवाई में संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक भागीदारी और व्यापक सहयोगी परामर्श का अभाव रहा। उन्होंने जोर दिया कि संघर्ष से जुड़े सभी पक्षों को अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना चाहिए।
कार्नी ने क्षेत्र में नागरिकों और नागरिक ढांचे पर हुए हमलों की निंदा की और सभी संबंधित देशों से संयम बरतने तथा तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक रास्ता अपनाने की अपील की।