शादी, परिवार और संतान जिन्हें लंबे समय तक समाज की बुनियादी इकाई माना गया आज वैश्विक स्तर पर नए मायने हासिल कर रहे हैं। बदलती जीवनशैली, कानूनों में ढील और सामाजिक सोच में आए बदलावों ने कई देशों में विवाह और मातृत्व के पारंपरिक रिश्ते को कमजोर कर दिया है। नतीजतन, कई जगहों पर शादी के बिना बच्चों का जन्म अब असामान्य नहीं रहा, जबकि कुछ समाजों में इसे आज भी स्वीकार नहीं किया जाता।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स बताती हैं कि दुनिया के अनेक देशों में विवाह के बाहर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि एशिया और कुछ रूढ़िवादी क्षेत्रों में यह चलन अभी सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, कानूनी संरक्षण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से भी जुड़ा हुआ है। कई देशों में अब संतान के लिए शादी अनिवार्य शर्त नहीं रह गई है और बिना विवाह के परिवार बनाना सामान्य माना जाने लगा है।
ओईसीडी (OECD) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर औसतन करीब 43 प्रतिशत बच्चे ऐसे माता-पिता से जन्म ले रहे हैं जो विवाह के बंधन में नहीं हैं। यानी बड़ी संख्या में महिलाएं बिना शादी के मां बन रही हैं। अलग-अलग देशों में यह प्रतिशत काफी भिन्न है।
लैटिन अमेरिका सबसे आगे
इस मामले में लैटिन अमेरिकी देश शीर्ष पर हैं। कोलंबिया में लगभग 87 प्रतिशत बच्चे विवाह के बाहर जन्म लेते हैं। चिली में यह आंकड़ा 78 प्रतिशत से अधिक है, जबकि कोस्टा रिका और मैक्सिको में यह क्रमशः 74 और 73 प्रतिशत के आसपास है। इन देशों में लिव-इन रिश्तों को लंबे समय से सामाजिक और कानूनी मान्यता मिली हुई है, जिससे औपचारिक विवाह की आवश्यकता कम होती जा रही है। साथ ही सामाजिक असमानता और कानूनी प्रक्रियाओं तक सीमित पहुंच ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।
नॉर्डिक देशों में सामाजिक सुरक्षा का असर
यूरोप के नॉर्डिक देशों में भी तस्वीर अलग नहीं है। आइसलैंड में करीब 69 प्रतिशत, नॉर्वे में 61 प्रतिशत, स्वीडन में लगभग 58 प्रतिशत और डेनमार्क में करीब 55 प्रतिशत बच्चे बिना विवाह के जन्म लेते हैं। इन देशों में मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रणाली और बच्चों को माता-पिता की वैवाहिक स्थिति से अलग समान अधिकार मिलने के कारण शादी को निजी फैसला माना जाता है। लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को भी कानूनन विवाहित दंपतियों के बराबर अधिकार हासिल हैं।
एशिया में अब भी कम आंकड़े
इसके उलट एशियाई और पूर्वी भूमध्यसागरीय देशों में विवाह के बाहर जन्म की दर बेहद कम है। जापान में यह केवल 2.4 प्रतिशत है, दक्षिण कोरिया में 4.7 प्रतिशत, तुर्की में 3.1 प्रतिशत और इजरायल व ग्रीस में भी यह 10 प्रतिशत से नीचे है। इन समाजों में पारंपरिक मूल्य, धार्मिक विश्वास और सख्त कानूनी ढांचा विवाह और संतान को आपस में जोड़े रखता है। एकल माता-पिता को सीमित सामाजिक समर्थन और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
भारत में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। यहां विवाह के बाहर जन्म लेने वाले बच्चों का प्रतिशत एक फीसदी से भी कम है। भारत के पड़ोसी देशों और एशिया के अधिकांश हिस्सों में सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराएं विवाह को प्राथमिकता देती हैं।
पश्चिमी देश बीच के रास्ते पर
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और पश्चिमी यूरोप के कई देश इस मामले में बीच की स्थिति में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे विवाह के बाहर पैदा होते हैं, जो ऑस्ट्रिया और इटली जैसे देशों के करीब है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक बदलाव नहीं दर्शाती, बल्कि इसके पीछे कानूनी ढांचे, कल्याणकारी नीतियों और सांस्कृतिक स्वीकार्यता की बड़ी भूमिका है। आने वाले समय में यह अंतर और गहरा हो सकता है, जिसका प्रभाव भारत सहित अन्य एशियाई देशों पर भी पड़ने की संभावना है।