कांग्रेस ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर महिला आरक्षण लागू करने में देरी करने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी पहले ही प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग कर चुके हैं, लेकिन सरकार ने इस दिशा में गंभीरता नहीं दिखाई और बाद में इस मुद्दे को परिसीमन से जोड़कर टालने की कोशिश की।

जयराम रमेश ने साझा किए पुराने पत्र

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर 2017 का वह पत्र साझा किया, जिसमें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पारित कराने की अपील की थी। सोनिया गांधी ने अपने पत्र में कहा था कि कांग्रेस इस ऐतिहासिक कानून के समर्थन में हमेशा रही है और आगे भी रहेगी, क्योंकि यह महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में अहम कदम साबित होगा।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया था कि पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण देने की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कांग्रेस सरकार की पहल से हुई थी, जिसे बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया।

राहुल गांधी की पुरानी मांग भी सामने आई

जयराम रमेश ने राहुल गांधी का भी एक पुराना पत्र सार्वजनिक किया, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से संसद के मानसून सत्र में महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने के लिए सहयोग की मांग की थी। राहुल गांधी ने लिखा था कि यह विधेयक 9 मार्च 2010 को राज्यसभा से पारित हो चुका था, लेकिन लोकसभा में यह अब तक लंबित है।

उन्होंने आग्रह किया था कि सरकार यदि वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर गंभीर है, तो बिना किसी शर्त के इस बिल का समर्थन करे और इसे आगामी सत्र में पारित कराया जाए। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी थी कि देरी होने पर इसे अगले आम चुनाव से पहले लागू करना मुश्किल हो सकता है।

विपक्ष की मौजूदा मांग

विपक्षी दलों ने मांग की है कि केंद्र सरकार मौजूदा लोकसभा की 543 सीटों के आधार पर ही महिला आरक्षण को तुरंत लागू करे और इसके लिए संसद के आगामी सत्र या मई के अंत तक नया विधेयक पेश किया जाए।

यह बयान ऐसे समय आया है जब सरकार का संविधान (131वां संशोधन) विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इस विधेयक में महिला आरक्षण लागू करने के साथ-साथ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव शामिल था।

बिल क्यों नहीं हो सका पारित

मतदान के दौरान 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। कुल 528 मत पड़े, जबकि इसे पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो सरकार को नहीं मिल पाया।

प्रस्तावित कानून में 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद 2029 के आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने की योजना थी। साथ ही, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान रखा गया था।