कोलकाता में I-PAC कार्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कथित हस्तक्षेप को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। इस दौरान ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता और राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के बीच तीखी बहस देखने को मिली।

सॉलिसिटर जनरल ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने छापेमारी के दौरान हस्तक्षेप किया और फाइलें जब्त कीं, जबकि सिब्बल ने सवाल उठाया कि चुनाव के बीच ईडी I-PAC क्यों पहुंची।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई अफरा-तफरी पर अपनी “गंभीर चिंता” जताई और इस मामले में नोटिस जारी करने की बात कही। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि यह एक संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें राज्य और केंद्रीय एजेंसी के बीच टकराव साफ दिख रहा है।

ईडी का पक्ष

एसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री और राज्य पुलिस ने जांच में बाधा डाली। मेहता ने कहा, “यह घटना चौंकाने वाली है। जब वैधानिक प्राधिकरण अपना काम कर रहा था, मुख्यमंत्री ने हस्तक्षेप किया। पुलिस आयुक्त उनके साथ थे और फिर धरना भी दिया गया।” उन्होंने कहा कि पीएमएलए की धारा 17 के तहत कार्रवाई की जा रही थी और इसे जानबूझकर प्रभावित किया गया।

एसजी ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा फाइलें जब्त करना, ईडी अधिकारी का फोन लेना और जांच में बाधा डालना “साफ़ चोरी और मनोबल गिराने वाला” कृत्य है। उन्होंने अधिकारियों के निलंबन और मुख्य सचिव सहित अन्य विभागीय अधिकारियों को पक्षकार बनाने की मांग भी की।

वकील कपिल सिब्बल का पक्ष

कपिल सिब्बल ने जवाब में कहा कि आरोपित कार्रवाई पूर्वाग्रहपूर्ण और वास्तविक घटनाओं के विपरीत है। उन्होंने बताया कि छापेमारी के समय प्रतीक जैन ने अपना लैपटॉप और निजी फोन ही ईडी को सौंपा और कोई फाइल जब्त नहीं हुई। सिब्बल ने सवाल उठाया कि चुनाव के बीच ईडी का I-PAC कार्यालय में पहुंचना क्यों आवश्यक था।

उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया कि हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार सुनवाई के दौरान केवल वकील ही प्रवेश कर सकते थे और उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे। सिब्बल ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप पंचनामा के विपरीत हैं और यह केवल पूर्वाग्रह पैदा करने का प्रयास है।

कोर्ट का रुख

न्यायमूर्ति मिश्रा ने दोनों पक्षों से सुनवाई के दौरान संयम बनाए रखने को कहा और सवाल किया कि क्या मामले में अधिकारियों को निलंबित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका में जांच की मांग सीधे राज्य से की जानी चाहिए, न कि सुप्रीम कोर्ट से।

सुनवाई के दौरान यह मामला राजनीतिक और संवैधानिक दोनों दृष्टिकोण से गहराई से सामने आया। कोर्ट ने नोटिस जारी करने की संभावना जताई और मामले की गंभीरता पर जोर दिया।