अरावली पर्वतमाला से जुड़े खनन मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुराने आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस निर्णय का स्वागत किया है। सोमवार को उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत के निर्देशों और उठाए गए मुद्दों का गहराई से अध्ययन करने के लिए नई समिति के गठन का फैसला सराहनीय है।

भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) इस समिति को हर स्तर पर आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराएगा। साथ ही उन्होंने दोहराया कि अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज जारी करने या पुरानी लीज के नवीनीकरण पर रोक पहले की तरह लागू रहेगी। मंत्री के अनुसार, सरकार अरावली पहाड़ियों के संरक्षण और पुनरुद्धार को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

कांग्रेस ने फैसले को बताया राहत, मंत्री से मांगा इस्तीफा

इस बीच कांग्रेस ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सकारात्मक कदम बताया है। पार्टी का कहना है कि अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा से जुड़े विवाद में अदालत का हस्तक्षेप जरूरी था। हालांकि कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और विशेष रूप से पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव पर तीखा हमला करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से “उम्मीद की किरण” है। उन्होंने कहा कि अब इस संवेदनशील विषय पर तथ्यों और वैज्ञानिक आधार पर विस्तार से विचार किया जाएगा। जयराम रमेश ने यह भी याद दिलाया कि इस नई परिभाषा पर पहले ही फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने आपत्तियां जताई थीं।

अरावली बचाने की लड़ाई अभी जारी: कांग्रेस

कांग्रेस का आरोप है कि यदि नई परिभाषा लागू होती, तो अरावली क्षेत्र को खनन, रियल एस्टेट और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए खोल दिया जाता, जिससे पारिस्थितिकी को भारी नुकसान पहुंचता। पार्टी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश ने मंत्री द्वारा दिए गए तर्कों को कमजोर कर दिया है, इसलिए उन्हें नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ना चाहिए।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने

सोमवार को अरावली खनन मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को दिए गए अपने पूर्व निर्देशों को फिलहाल स्थगित कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस प्रकरण में कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन पर सरकार से स्पष्ट जवाब जरूरी है। अदालत ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा से जुड़े मुद्दों पर और स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।

24 दिसंबर के निर्देश और आगे की प्रक्रिया

इससे पहले 24 दिसंबर को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस विषय पर नए दिशा-निर्देश जारी किए थे। इनमें कहा गया था कि अरावली क्षेत्र में नए खनन को मंजूरी देने पर रोक पूरी पर्वतमाला पर लागू रहेगी, ताकि इसकी भूवैज्ञानिक निरंतरता और पारिस्थितिक संतुलन सुरक्षित रखा जा सके।

मंत्रालय के अनुसार, इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त इलाकों की पहचान करे, जहां खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध जरूरी है। यह अध्ययन उन क्षेत्रों से अलग होगा, जहां पहले से ही खनन पर रोक लागू है।