रांची। झारखंड की ग्रामीण विकास, ग्रामीण कार्य एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने विधानसभा में स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य किसी भी कीमत पर मनरेगा के स्वरूप में बदलाव बर्दाश्त नहीं करेगा।

मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित “विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) – वीबी-जी राम” योजना दरअसल मनरेगा को कमजोर करने की दिशा में एक गंभीर कदम है। उनका कहना था कि यह न केवल ग्रामीण गरीबों के रोजगार के अधिकार को प्रभावित करेगा बल्कि उनकी मजदूरी सुरक्षा और ग्राम सभाओं की संवैधानिक भूमिका को भी कमजोर करने का प्रयास है।

राज्यों पर वित्तीय दबाव और सामाजिक प्रभाव

दीपिका पांडेय सिंह ने सदन को बताया कि इस नए प्रस्ताव के लागू होने से रोजगार की कानूनी गारंटी कमजोर हो सकती है, मजदूरी भुगतान और कार्य दिवसों की निरंतरता प्रभावित हो सकती है, और राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी पड़ सकता है।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य कमजोर वर्गों को मिलने वाली सुरक्षा और अवसर इस नए कानून में कमजोर हो सकते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली मनरेगा को कमजोर करना सीधे तौर पर सामाजिक न्याय के खिलाफ होगा।

150 दिनों का रोजगार सुनिश्चित करने की मांग

मंत्री ने केंद्र सरकार से स्पष्ट मांग की कि मनरेगा के मौजूदा ढांचे को सुरक्षित रखा जाए और इसे और सशक्त करते हुए कम से कम 150 दिन का रोजगार दिया जाए, ताकि ग्रामीण परिवारों को स्थायी आर्थिक सुरक्षा मिल सके और मजबूरी में पलायन रोकने में मदद मिले।

उन्होंने जोर देकर कहा, “मनरेगा पर कोई भी हमला गरीबों के अधिकारों और उनके सम्मान पर सीधा प्रहार है। झारखंड इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा।”

झारखंड सरकार ने केंद्र को यह संदेश भी दिया कि वह ग्रामीण श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और आवश्यकता पड़ने पर हर स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करेगी।