बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल उधार दिए गए पैसे की वसूली करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment) की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ एक स्कूल शिक्षक की आत्महत्या से जुड़े मामले में छह आरोपियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

यह मामला महाराष्ट्र के कोल्हापुर का है, जहां शिक्षक दिलीप मांडे की मौत के बाद उनके परिवार ने आरोप लगाया था कि उन्हें लोन रिकवरी एजेंटों द्वारा लगातार परेशान किया जा रहा था, जिसके चलते उन्होंने आत्महत्या कर ली। इस शिकायत के आधार पर अमित मोरे सहित छह लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 306 के तहत केस दर्ज किया गया था।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी पैसे उधार देने और उसकी वसूली से जुड़े काम में शामिल थे। आरोप था कि लगातार दबाव और कथित उत्पीड़न के कारण शिक्षक ने 2022 में जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जान दे दी।

हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार्जशीट को खारिज करते हुए कहा कि केवल कर्ज की वापसी के लिए बार-बार अनुरोध या याद दिलाना आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति रंजीत सिंह राजा भोंसले की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि IPC की धारा 306 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह जरूरी है कि आरोपी का स्पष्ट इरादा किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का हो। अदालत के अनुसार, इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत या इरादा FIR में सामने नहीं आता।