अयोध्या में राम मंदिर की दान राशि में कथित अनियमितताओं की जांच अब नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मामले की पड़ताल केवल कर्मचारियों या बाहरी व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि ट्रस्ट के कुछ जिम्मेदार पदाधिकारियों और ट्रस्टियों की भूमिका भी जांच एजेंसियों के रडार पर आ सकती है।
जानकारी के अनुसार, अब तक जिन पांच संदिग्धों के नाम सामने आए हैं, उनके संबंध ट्रस्ट से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों तक पहुंचने की चर्चा है। इसी वजह से विशेष जांच दल (एसआईटी) को वित्तीय लेन-देन के साथ-साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियों और संभावित संरक्षण के पहलुओं की भी गहन जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।
शुरुआत में इस मामले की समीक्षा ट्रस्ट स्तर पर ही की जा रही थी, लेकिन प्रकरण की गंभीरता और इसकी व्यापक संवेदनशीलता को देखते हुए शासन ने स्वतंत्र जांच कराने का फैसला लिया। इसके बाद तीन वरिष्ठ अधिकारियों की एसआईटी गठित की गई, जिसे एक सप्ताह के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट और 15 दिनों में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सूत्रों के मुताबिक जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि कथित वित्तीय गड़बड़ी कितने समय से चल रही थी, इसमें किन-किन लोगों की भूमिका रही और क्या किसी अधिकारी या पदाधिकारी की जानकारी, लापरवाही या संभावित मिलीभगत के कारण यह संभव हो सका। यदि जांच में किसी ट्रस्टी या जिम्मेदार पदाधिकारी की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता सामने आती है, तो उनके खिलाफ प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
इस बीच, मामले के सामने आने के बाद ट्रस्ट के अंदरूनी माहौल में भी असहजता की चर्चा है। सूत्रों का दावा है कि शीर्ष स्तर पर संवाद और समन्वय प्रभावित हुआ है। कुछ प्रमुख ट्रस्टियों और वरिष्ठ पदाधिकारियों के बीच संपर्क और बातचीत को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं, हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
फिलहाल सभी की नजरें एसआईटी की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित गड़बड़ी की जिम्मेदारी किस स्तर तक जाती है और आगे क्या कार्रवाई की जाती है।