ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के माघ मेला क्षेत्र से काशी प्रस्थान के बाद बुधवार को उनके शिविर को भी शिष्यों द्वारा समेट लिया गया। शिविर में ठहरे श्रद्धालु और शिष्य उसी दिन काशी के लिए रवाना हो गए। शंकराचार्य के प्रमुख शिष्य स्वामी मुकुंदानंद ने बताया कि गुरुदेव ने भारी मन से माघ मेला छोड़ा और गंगा स्नान किए बिना ही वहां से प्रस्थान किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन की ओर से सुविधाओं का प्रलोभन देकर उनकी परंपरागत टेक से हटने का दबाव बनाया गया, लेकिन शंकराचार्य ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

टेक नहीं छोड़ी, केवल मेला छोड़ा
स्वामी मुकुंदानंद ने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य ने अपनी टेक नहीं छोड़ी है, बल्कि परिस्थितियों को देखते हुए माघ मेला छोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि यह प्रण किसी एक समय या पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक कायम रहेगा। जब तक मेला प्रशासन ससम्मान गंगा स्नान की व्यवस्था नहीं करता, तब तक यह टेक जारी रहेगी। उन्होंने यह भी बताया कि अगले वर्ष माघ मेला आने पर भी शंकराचार्य शिविर के भीतर नहीं, बल्कि बाहर पालकी पर ही विराजमान रहेंगे।

10–11 मार्च को दिल्ली में साधु-संतों की बैठक
स्वामी मुकुंदानंद के अनुसार, आगामी 10 और 11 मार्च को देशभर के साधु-संत दिल्ली में एकत्र होंगे। इस दौरान गोहत्या पर रोक समेत विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। माघ मेले में हुई घटनाओं को लेकर भी चर्चा प्रस्तावित है। चारों शंकराचार्यों की उपस्थिति के सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि कोई एक शंकराचार्य भी उपस्थित होंगे, तो वे सभी के प्रतिनिधि माने जाएंगे।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष माघ मेले में शिविर के माध्यम से सवा लाख शिवलिंगों के दर्शन कराने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन मौनी अमावस्या के दिन हुए विवाद के कारण यह संकल्प पूरा नहीं हो सका। शंकराचार्य के प्रस्थान के बाद शिविर में स्थापित शिवलिंगों को भी अब वापस ले जाया जा रहा है।