व्यक्तिगत कानून अपराधों का कवच नहीं बन सकते: तीन तलाक और हलाला पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि निकाह, हलाला और तीन तलाक जैसी धार्मिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किसी महिला के यौन शोषण को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य संविधान में निहित समानता, गरिमा और न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत हैं और इन्हें किसी भी स्थिति में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने इस मामले में दाखिल याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ लेकर आपराधिक कृत्यों से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने प्रथम दृष्टया इसे एक नाबालिग लड़की के साथ सुनियोजित तरीके से किए गए गंभीर अपराध का मामला माना और कहा कि इसकी विस्तृत जांच आवश्यक है।
अमरोहा की घटना पर सुनवाई
मामला अमरोहा जिले के सैदनागली थाना क्षेत्र से जुड़ा है। दर्ज एफआईआर के अनुसार, पीड़िता का विवाह वर्ष 2015 में उस समय कराया गया था जब उसकी उम्र करीब 15 वर्ष थी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि बाद में उसे तीन तलाक, निकाह हलाला और पुनर्विवाह की प्रक्रिया में बार-बार शामिल कर उसका शोषण किया गया।
पीड़िता का कहना है कि फरवरी 2025 में दोबारा निकाह कराने का भरोसा देकर उसे हलाला के नाम पर प्रताड़ित किया गया। मामले में पूर्व पति, एक मौलाना, रिश्तेदारों और अन्य लोगों के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं।
एफआईआर रद्द कराने की मांग ठुकराई
आरोपियों ने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर मुकदमा निरस्त करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि संबंधित घटनाएं उस समय हुईं जब तीन तलाक और निकाह हलाला को धार्मिक कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त थी। साथ ही उन्होंने दावा किया कि पीड़िता बालिग थी और विवाद पारिवारिक तथा संपत्ति संबंधी मतभेदों का परिणाम है।
हालांकि, राज्य पक्ष ने अदालत को बताया कि मामला बेहद गंभीर है और इसमें नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म जैसे आरोप शामिल हैं। ऐसे में निष्पक्ष और गहन जांच जरूरी है।
'समाज और मानवता के खिलाफ अपराध'
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अब तक सामने आए तथ्य बेहद चिंताजनक हैं और समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाले हैं। कोर्ट के अनुसार, आरोपियों की भूमिका प्रथम दृष्टया एक संगठित समूह जैसी प्रतीत होती है, जिसने कानून के दायरे से बाहर जाकर कार्य किया।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जांच के शुरुआती चरण में किसी भी आरोपी को एफआईआर रद्द कराने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि कुछ लोगों की भूमिका प्रत्यक्ष तो कुछ की सहयोगी या साजिशकर्ता के रूप में हो सकती है, लेकिन इन सभी पहलुओं की जांच विवेचना के दौरान की जाएगी।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.



















Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.