वैश्विक स्तर पर सोने की मांग में एक बार फिर बढ़ोतरी देखने को मिली है, जिसका मुख्य कारण भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ता रुझान माना जा रहा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही (जनवरी–मार्च) में दुनिया भर में सोने की कुल मांग 2 प्रतिशत बढ़कर 1,231 टन तक पहुंच गई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 1,205 टन थी।
रिकॉर्ड कीमतों ने बढ़ाया बाजार का मूल्य
हालांकि मात्रा में बढ़ोतरी सीमित रही, लेकिन कीमतों में तेज उछाल ने बाजार के कुल मूल्य को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सोने का वैश्विक मूल्य 74 प्रतिशत बढ़कर लगभग 193 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसी अवधि में सोने की औसत कीमत में भी 81 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 4,873 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। विशेषज्ञों के अनुसार, इस दौरान कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला और जनवरी में यह 5,400 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर गई थी।
निवेश की ओर बढ़ा रुझान, आभूषणों की मांग घटी
सोने के बार और सिक्कों में निवेश इस तिमाही में सबसे मजबूत रहा, जिसमें 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और कुल मांग 474 टन तक पहुंच गई। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच निवेशकों ने सोने को सुरक्षित विकल्प के रूप में चुना है।
चीन इस वृद्धि में सबसे आगे रहा, जहां बार और सिक्कों की मांग 67 प्रतिशत बढ़कर 207 टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। भारत, अमेरिका, यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया में भी निवेश मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इसके विपरीत, सोने के आभूषणों की मांग में गिरावट देखी गई। वैश्विक स्तर पर यह 23 प्रतिशत घटकर 300 टन रह गई। चीन, भारत और मध्य पूर्व जैसे प्रमुख बाजारों में कीमतों के दबाव के कारण आभूषण खरीद में कमी आई है।
केंद्रीय बैंकों की सक्रिय खरीदारी
इस अवधि में केंद्रीय बैंकों ने भी सोने की मांग को मजबूत समर्थन दिया। विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों ने मिलकर अपने भंडार में 244 टन सोना जोड़ा। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इस दौरान अपनी गोल्ड होल्डिंग्स में 300 किलोग्राम की वृद्धि की। वहीं कुछ देशों ने सीमित स्तर पर बिकवाली भी की।
आगे का रुझान
विशेषज्ञों का अनुमान है कि भू-राजनीतिक तनाव बने रहने की स्थिति में एशियाई बाजारों में सोने की मांग मजबूत बनी रह सकती है। हालांकि, पश्चिमी देशों में ऊंची ब्याज दरें और वैश्विक आर्थिक दबाव बाजार के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। उत्पादन और आपूर्ति स्थिर रहने की संभावना है, लेकिन ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव इसका असर डाल सकता है।