पश्चिम एशिया इस समय भारी तनाव और संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। क्षेत्र में हालिया घटनाओं के बाद हालात युद्ध जैसे बन गए हैं। बताया जा रहा है कि इजरायल और अमेरिका की ओर से ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद स्थिति और गंभीर हो गई। इसके जवाब में ईरान ने भी अपने विरोधी देशों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है।

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने सहयोगी देशों से इस संघर्ष में साथ देने की अपील की है। हालांकि ब्रिटेन ने इस मामले में अलग रुख अपनाया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री Keir Starmer ने साफ कर दिया है कि उनका देश ईरान के खिलाफ किसी सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लेगा।

ब्रिटेन ने युद्ध से बनाई दूरी

प्रधानमंत्री स्टार्मर ने स्पष्ट कहा कि यह संघर्ष ब्रिटेन की सीधी लड़ाई नहीं है और उनकी सरकार देश की सेना को किसी ऐसे आक्रामक अभियान में शामिल नहीं करेगी, जिससे राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचे। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब नाटो के कई सहयोगी देशों की ओर से ब्रिटेन पर युद्ध में शामिल होने का दबाव बताया जा रहा था।

35 देशों की अंतरराष्ट्रीय बैठक की तैयारी

हालांकि ब्रिटेन ने संघर्ष से दूरी बनाते हुए कूटनीतिक पहल शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री स्टार्मर ने घोषणा की है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए इस सप्ताह करीब 35 देशों की एक अहम बैठक आयोजित की जाएगी।

इस बैठक की अध्यक्षता ब्रिटेन की गृह सचिव Yvette Cooper करेंगी। बैठक में यह विचार किया जाएगा कि कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर कौन-से कदम उठाकर होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित समुद्री मार्ग फिर से शुरू कराया जा सकता है।

ब्रिटेन का कहना है कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य वहां फंसे जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को दोबारा सामान्य बनाना है।

सैन्य योजनाकारों से भी होगी चर्चा

प्रधानमंत्री स्टार्मर ने बताया कि इस बैठक के बाद सैन्य विशेषज्ञों और योजनाकारों के साथ भी चर्चा की जाएगी। इसमें यह तय किया जाएगा कि भविष्य में इस अहम समुद्री मार्ग को सुरक्षित और सुचारु बनाए रखने के लिए किस तरह की रणनीति अपनाई जा सकती है।

अमेरिका को सैन्य ठिकाने के सीमित इस्तेमाल की अनुमति

ब्रिटेन ने पूरी तरह हाथ खींचने के बजाय सीमित सहयोग का रास्ता भी खुला रखा है। लंदन ने अमेरिका को साइप्रस स्थित अपने सैन्य अड्डे RAF Akrotiri के उपयोग की अनुमति दी है।

हालांकि इस पर स्पष्ट शर्तें लागू की गई हैं। ब्रिटेन सरकार के अनुसार इस ठिकाने का उपयोग केवल रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकेगा, जैसे कि मिसाइल या ड्रोन हमलों को रोकना। हाल ही में रॉयल एयर फोर्स ने खाड़ी क्षेत्र में सहयोगियों की मदद के दौरान कुछ ईरानी ड्रोन को मार गिराने का दावा किया था।

अमेरिका की नाराजगी के संकेत

ब्रिटेन के इस रुख से अमेरिका में नाराजगी के संकेत भी सामने आए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि सैन्य ठिकानों के व्यापक इस्तेमाल की अनुमति न देना दोनों देशों के पुराने संबंधों में दूरी का संकेत हो सकता है।

आर्थिक कारण भी अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन का यह फैसला आर्थिक चिंताओं से भी जुड़ा है। अगर संघर्ष बढ़ता है और स्वेज नहर तथा होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी संभव है।

फिलहाल ब्रिटेन सरकार ने साफ संकेत दिया है कि वह सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देगी और देश की सुरक्षा व आर्थिक स्थिरता को सर्वोच्च महत्व देगी।