अमेरिका में प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त नागरिकों के अधिकारों को सीमित करने के प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। रिपब्लिकन सांसद नैन्सी मेस ने एक संवैधानिक संशोधन पेश करते हुए सुझाव दिया है कि ऐसे नागरिक, जिन्होंने बाद में अमेरिकी नागरिकता हासिल की है, उन्हें कांग्रेस, संघीय न्यायपालिका और सीनेट से अनुमोदित महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त न किया जाए।

इस प्रस्ताव के सामने आते ही डेमोक्रेटिक नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे विदेशी मूल के नागरिकों के खिलाफ भेदभावपूर्ण और आपत्तिजनक कदम बताया है।

क्या है प्रस्ताव का आधार

प्राकृतिक नागरिकता से आशय उन लोगों से है जो किसी देश में जन्मे नहीं होते, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी कर नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं। मेस का तर्क है कि जैसे अमेरिका में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए जन्म से नागरिक होना अनिवार्य है, वैसे ही अन्य शीर्ष संवैधानिक पदों पर भी यही नियम लागू होना चाहिए।

सांसद मेस ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह संशोधन लंबे समय से विचाराधीन था और अब इसे आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने कुछ डेमोक्रेटिक सांसदों की तस्वीरें साझा करते हुए उनके विदेशी मूल का भी उल्लेख किया।

लोकतंत्र और निष्ठा पर तर्क

मेस का कहना है कि अमेरिकी संस्थानों में ऐसे लोगों की भागीदारी सीमित होनी चाहिए जिनकी निष्ठा पूरी तरह अमेरिका के प्रति हो। उन्होंने दावा किया कि देश की नीति निर्धारण प्रक्रिया और न्यायिक व्यवस्था में शामिल व्यक्तियों का पूर्ण रूप से अमेरिकी हितों के प्रति समर्पित होना आवश्यक है।

व्यापक असर की संभावना

यह प्रस्ताव केवल डेमोक्रेटिक नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसदों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस में कई सदस्य विदेशी मूल के हैं।

तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया

डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए इसे नस्लीय मानसिकता से प्रेरित बताया है।

भारतीय मूल की सांसद प्रमिला जयपाल ने इसे अमेरिकी लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ बताया। वहीं, सांसद श्री थानेदार ने कहा कि यह उन लोगों को निशाना बनाने जैसा है जिन्होंने मेहनत करके अमेरिका में अपनी पहचान बनाई है।

कई अन्य सांसदों ने भी इस कदम की आलोचना करते हुए इसे विभाजनकारी राजनीति बताया और कहा कि यह अमेरिकी समाज में विविधता और समावेश की भावना के विपरीत है।

विभिन्न संसदीय समूहों और कॉकस संगठनों ने भी इस प्रस्ताव की निंदा करते हुए कहा है कि यह उन प्रतिनिधियों को कमजोर करने की कोशिश है जो अपने समुदायों और लोकतंत्र की सेवा कर रहे हैं।