पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में बढ़ते संघर्ष को रोकने की कोशिश में तीन आतंकवादियों को काबुल भेजा है। इन तीनों के नाम फजलुर रहमान खलील, अब्दुल्ला शाह मजहर (पीर मजहर शाह) और कारी साजिद उस्मान हैं। उन्हें तालिबान के नेताओं से बातचीत के लिए भेजा गया है, हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने केवल कहा कि ये सभी धार्मिक नेता हैं और इनके बारे में अधिक जानकारी साझा नहीं की जा सकती।
बीबीसी ऊर्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, फजलुर, मजहर और उस्मान पिछले दो दिन से काबुल में मौजूद हैं। ये सभी पहले पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सक्रिय थे। उन्हें ऐसे समय में भेजा गया है जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है।
तीनों का परिचय:
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फजलुर रहमान खलील – खलील 1980 के दशक में हरकत-उल मुजाहिद्दीन के प्रमुख रहे। उन्हें तालिबान के कई नेताओं के साथ अच्छे संबंधों के लिए जाना जाता है। वह मूल रूप से खैबर पख्तूनख्वाह के रहने वाले हैं और वर्तमान में पीओके के दो मदरसों के प्रमुख हैं, जहां आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। खलील को पहले ओसामा बिन लादेन का राइट हैंड भी माना जाता था।
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अब्दुल्ला शाह मजहर – मजहर जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के करीबी माने जाते हैं। वह पीओके में आतंकी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं और वर्तमान में तहरीक-ए-गल्बा-ए-इस्लाम के प्रमुख पद पर हैं। मजहर की पकड़ तालिबान के भीतर अच्छी है, इसलिए उन्हें शांतिदूत के रूप में भेजा गया।
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कारी साजिद उस्मान – कारी उस्मान ने अपने भाई साजिद के मार्गदर्शन में आतंकवाद की राह अपनाई। उनके भाई ने तालिबान के लिए सोवियत संघ के खिलाफ जिहाद का नेतृत्व किया था। कारी उस्मान पाकिस्तान, सऊदी अरब और अफगानिस्तान में रहते हैं और पुराने रिश्तों का हवाला देकर उन्हें काबुल भेजा गया।
इनकी भूमिका:
पाकिस्तान की सरकार चीन, कतर, सऊदी अरब और तुर्की की मदद से तालिबान से बातचीत कर रही थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सीजफायर पर सहमति नहीं बन पा रही थी। पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंजदा एक फतवा जारी करें, जिसमें पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों पर रोक लगाने की बात हो। तालिबान ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि आतंकवाद पाकिस्तान का घरेलू मामला है।
इस स्थिति में पाकिस्तान ने तीनों आतंकियों को शांतिदूत के रूप में भेजकर युद्ध को रोकने की कोशिश की है। आर्थिक संकट और पड़ोसी ईरान में चल रहे संघर्ष के कारण पाकिस्तान के लिए यह कदम अहम माना जा रहा है।