विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि भारत ने ईरान के नौसैनिक जहाज ‘आईरिस लावन’ को कोच्चि पोर्ट में डॉक करने की अनुमति मानवीय दृष्टिकोण से दी थी। उन्होंने बताया कि जहाज में तकनीकी समस्या उत्पन्न होने के बाद ईरान ने भारत से मदद मांगी थी, जिसके आधार पर यह निर्णय लिया गया।
तकनीकी समस्या के कारण मांगी गई मदद
विदेश मंत्री ने कहा कि पहले ईरान का एक अन्य जहाज ‘आईरिस देना’ अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में डूब गया था। इसके बाद ‘आईरिस लावन’ ने तकनीकी खराबी की जानकारी दी और भारतीय बंदरगाह में आने की अनुमति मांगी। यह अनुरोध 28 फरवरी के आस-पास भारत को मिला और 1 मार्च को जहाज को कोच्चि पोर्ट में प्रवेश की इजाजत दे दी गई। कुछ दिनों की यात्रा के बाद जहाज पोर्ट पर पहुंचा, और इसके 183 क्रू मेंबर वर्तमान में कोच्चि स्थित नौसैनिक सुविधाओं में ठहरे हुए हैं।
जयशंकर ने कहा कि जहाज पर कई युवा कैडेट भी मौजूद थे। भारत ने इसे मानवीय दृष्टिकोण से देखा और समय पर सहायता प्रदान की। उन्होंने बताया कि संकट में जहाज की मदद करना ही सही कदम था, और यही भारत ने किया।
अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू में हिस्सा लेने आया था जहाज
विदेश मंत्री ने कहा कि यह जहाज अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू और युद्धाभ्यास मिलन 2026 में भाग लेने भारत आया था, जो 15 फरवरी से 25 फरवरी के बीच आयोजित हुआ था। उस समय क्षेत्रीय हालात सामान्य थे, लेकिन बाद में परिस्थितियां अचानक बदल गईं और जहाज तकनीकी दिक्कतों में फंस गया।
हिंद महासागर की सुरक्षा और भारत की भूमिका
जयशंकर ने हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि डिएगो गार्सिया और जिबूती जैसे विदेशी सैन्य ठिकाने दशकों से मौजूद हैं, जबकि हंबनटोटा पोर्ट जैसे परियोजनाएं पिछले वर्षों में सामने आई हैं। भारत पिछले दशक से इस क्षेत्र में व्यापार, कनेक्टिविटी और समुद्री सहयोग को मजबूत करने के लिए निवेश कर रहा है।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर जोर
विदेश मंत्री ने बताया कि दुनिया भर की कई मर्चेंट शिप्स पर बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। समुद्री जहाजों पर हमलों के समय उनकी सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। साथ ही, खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं, जिनकी सुरक्षा भी भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा है।