पश्चिम एशिया में हालात तनावपूर्ण बने रहने के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच गुरुवार को महत्वपूर्ण बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने क्षेत्र में बिगड़ती स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की और इसे संभालने के लिए बातचीत और कूटनीतिक मार्ग अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता को जल्द बहाल करना बेहद जरूरी है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किए संदेश में बताया कि उन्होंने अपने मित्र फ्रांस के राष्ट्रपति से क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की। दोनों नेताओं ने मौजूदा संकट का समाधान केवल संवाद और कूटनीति से ही संभव होने पर सहमति जताई। उन्होंने यह भी कहा कि वे नियमित संपर्क और समन्वय बनाए रखेंगे ताकि हालात को जल्द सामान्य किया जा सके।

फ्रांस ने बढ़ाई सैन्य तत्परता

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच फ्रांस ने अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव किया है। राष्ट्रपति मैक्रों ने अपने परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल को बाल्टिक सागर से भूमध्यसागर की ओर तैनात करने का आदेश दिया है। इसके साथ कई फ्रिगेट जहाज और एयर विंग के लड़ाकू विमान भी तैनात किए गए हैं, ताकि सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

फ्रांस ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करते हुए राफेल लड़ाकू विमान, एयर डिफेंस सिस्टम और हवाई निगरानी के लिए विशेष रडार प्लेटफॉर्म भी तैनात किए हैं। राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि जरूरत पड़ने पर फ्रांस अपने सहयोगी देशों की रक्षा के लिए और कदम उठा सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर की गई सैन्य कार्रवाई में फ्रांस सीधे शामिल नहीं है।

ड्रोन हमलों से निपटने का दावा

मैक्रों ने बताया कि संघर्ष शुरू होने के दौरान फ्रांसीसी सेना ने हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए कई ड्रोन को मार गिराया था। इस कदम को सहयोगी देशों के हवाई क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया। हालांकि उन्होंने इस कार्रवाई के तकनीकी विवरण साझा नहीं किए।

अमेरिकी विमानों को सीमित अनुमति

फ्रांस ने कुछ सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी विमानों को अस्थायी रूप से रहने की अनुमति दी है। फ्रांसीसी रक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह केवल सहयोगी देशों की सुरक्षा को समर्थन देने के उद्देश्य से किया गया है और इन ठिकानों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए नहीं किया जाएगा। फ्रांस का स्पष्ट कहना है कि उनका उद्देश्य क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।