'छाती दबाना और सलवार उतारने की कोशिश रेप का प्रयास नहीं', पटना HC के आदेश पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की रिपोर्ट सभी हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया।
- सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट के हालिया फैसले का भी जिक्र हुआ, जिसमें रेप की कोशिश को लेकर टिप्पणी की गई थी।
- शीर्ष अदालत ने कहा कि यौन अपराध मामलों में अदालतें और पुलिस तय दिशानिर्देशों व हैंडबुक का पालन करें।
- सीजेआई सूर्यकांत ने न्यायिक अधिकारियों को कानून और पूर्व फैसलों पर पर्याप्त रिसर्च करने की जरूरत बताई।
नई दिल्ली। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा है कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) द्वारा तैयार की गई "न्यायिक संवेदनशीलता और यौन अपराध मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण" संबंधी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइटों पर उपलब्ध कराया जाए, ताकि न्यायिक अधिकारियों और संबंधित पक्षों को इसका व्यापक संदर्भ मिल सके।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद बनी थी रिपोर्ट
यह रिपोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट के मार्च 2025 के उस विवादित आदेश के बाद तैयार कराई गई थी, जिसमें कहा गया था कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना अपने आप में रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई शुरू की थी।
पटना हाई कोर्ट के फैसले का भी उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत का ध्यान हाल ही में आए पटना हाई कोर्ट के एक फैसले की ओर दिलाया। उन्होंने कहा कि 9 जुलाई के आदेश में भी अदालत ने महिला की सलवार उतारने और उसके साथ अश्लील हरकतों को रेप की कोशिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना था। उनका कहना था कि इस तरह की टिप्पणियां समय-समय पर सामने आती रही हैं।
जजों को रिसर्च करने की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति वी. मोहना ने सवाल किया कि क्या पटना हाई कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का संज्ञान लिया था। वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे संबंधित कानून और पूर्व फैसलों का अध्ययन करें। उन्होंने टिप्पणी की कि केवल स्टाफ पर निर्भर रहने के बजाय न्यायाधीशों को भी आवश्यक शोध करना चाहिए।
पुलिस और अदालतों को हैंडबुक अपनाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में तैयार की गई न्यायिक हैंडबुक का पालन सभी अदालतें करें। साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान भी इसी हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करे। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले का विस्तृत और तर्कपूर्ण निर्णय भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा।
क्या था पटना हाई कोर्ट का मामला?
पटना हाई कोर्ट का मामला वर्ष 2008 की एक घटना से जुड़ा था। आरोप था कि एक फोटोग्राफी स्टूडियो के संचालक ने युवती को स्टूडियो के अंदर रोककर उसके साथ छेड़छाड़ की, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसके साथ अशोभनीय हरकतें कीं। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप की कोशिश और अन्य धाराओं में दोषी ठहराया था।
हालांकि, अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रेप की कोशिश का आरोप सिद्ध नहीं होता। अदालत ने मेडिकल साक्ष्य और जांच प्रक्रिया में कमियों का उल्लेख करते हुए आरोपी को रेप की कोशिश के आरोप से राहत दी, लेकिन यह माना कि उसके कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने के अपराध की श्रेणी में आते हैं।
न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करते समय न्यायिक अधिकारियों को संवेदनशील, संतुलित और कानून के अनुरूप दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अदालत का मानना है कि न्यायिक प्रशिक्षण और स्पष्ट दिशानिर्देश ऐसे मामलों में फैसलों की गुणवत्ता और एकरूपता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
Comments0
Leave a comment
Join the conversation — your email will not be published.





















Reader comments
No comments yet
Be the first to share your perspective on this story.