नई दिल्ली में सड़क सुरक्षा और राष्ट्रीय राजमार्गों पर बढ़ती अव्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना है कि राजमार्ग केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षित आवाजाही से सीधे जुड़े हुए हैं, और इन्हें लापरवाही या अतिक्रमण के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि “सुरक्षित यात्रा का अधिकार” संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। इसी आधार पर कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवैध पार्किंग और अतिक्रमण के खिलाफ कड़े अंतरिम निर्देश जारी किए हैं।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर सख्ती बढ़ी
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अब राष्ट्रीय राजमार्गों की मुख्य सड़कों और किनारों पर भारी और व्यावसायिक वाहनों की पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी। यह छूट केवल अधिकृत पार्किंग स्थलों या निर्धारित विश्राम सुविधाओं को ही दी जाएगी।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि राजमार्गों के किनारे बने अवैध ढाबों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को 60 दिनों के भीतर हटाया जाए। किसी भी सुरक्षा क्षेत्र में अब बिना अनुमति न तो नया लाइसेंस जारी होगा और न ही पुराने लाइसेंस का नवीनीकरण किया जाएगा।
सुरक्षा और आपात व्यवस्था को लेकर निर्देश
अदालत ने सड़क सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए देशभर में जिला स्तर पर “राजमार्ग सुरक्षा टास्क फोर्स” बनाने का आदेश दिया है, जिसकी जिम्मेदारी जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को संयुक्त रूप से दी जाएगी।
साथ ही यह भी कहा गया है कि हर 75 किलोमीटर के अंतराल पर जीवनरक्षक सुविधाओं वाली एम्बुलेंस और रिकवरी क्रेन की तैनाती अनिवार्य की जाए। इसके अलावा, हाईवे पर रियल-टाइम निगरानी के लिए आधुनिक ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम और ई-चालान व्यवस्था लागू करने पर भी जोर दिया गया है, ताकि नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके।