केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नई व्यवस्था के अनुसार, यदि किसी आधिकारिक कार्यक्रम में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ दोनों प्रस्तुत किए जाएं, तो पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद गाए जाएंगे।

इन निर्देशों पर एआईएमआईएम के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष शोएब जमई ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। समाचार एजेंसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से विवादित बना रही है। उनका आरोप है कि ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य बनाने का प्रयास धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा प्रश्न खड़ा करता है। उन्होंने कहा है कि मुसलमानों की गर्दन पर छुरी रखकर वंदे मातरम नहीं कहलवा सकते।

जमई ने कहा कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का सम्मान सभी नागरिक करते हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ को लेकर मुस्लिम विद्वानों की अलग राय रही है। उनके अनुसार, कुछ उलेमाओं ने इसे इस्लाम के एकेश्वरवाद की अवधारणा से अलग बताया है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 15, 21 और 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक समुदाय पर किसी विशेष पाठ को थोपना उचित नहीं है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। जमई के मुताबिक, सरकार को अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।

उधर, गृह मंत्रालय द्वारा जारी प्रोटोकॉल में कहा गया है कि राष्ट्रपति के आगमन, ध्वजारोहण समारोह या राज्यपाल के संबोधन जैसे औपचारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद गाए जाएंगे। यह आदेश 28 जनवरी को जारी किया गया था।

केंद्र की इस पहल पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी आपत्ति जताई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे ‘एकतरफा निर्णय’ बताते हुए पुनर्विचार की मांग की है।

फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।