दिल्ली में ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने बांग्लादेश में चल रही हिंसा और अस्थिरता को लेकर अपनी राय सामने रखी है। उन्होंने कहा कि किसी भी निर्दोष की हत्या निंदनीय है और इस्लाम किसी की जान लेने की अनुमति नहीं देता, लेकिन बांग्लादेश की घटनाओं को सीधे तौर पर ‘नरसंहार’ की संज्ञा देना सही नहीं है। उनके अनुसार, इस तरह के शब्दों का चयन कई बार दोहरे मानदंडों को उजागर करता है।

मौलाना रशीदी ने अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि यदि बांग्लादेश में हुई हत्याओं को नरसंहार कहा जा रहा है, तो फिर गाजा और फिलिस्तीन में हुई व्यापक मौतों को किस श्रेणी में रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन में हजारों नहीं, बल्कि लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और बड़ी संख्या में बच्चों की जान गई है, लेकिन वहां की घटनाओं को उसी पैमाने पर नहीं देखा गया।

उन्होंने बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि वहां की यूनुस सरकार फिलहाल कमजोर नजर आ रही है, जिसके चलते हालात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। मौलाना रशीदी का कहना था कि बांग्लादेश के मामलों को विशेष रूप से इसलिए नरसंहार का नाम दिया जा रहा है, क्योंकि पीड़ित समुदाय हिंदू है।

भारत के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि देश में बीते वर्षों में भीड़ हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं। उनके अनुसार, धार्मिक नारों से जुड़ी घटनाओं में दर्जनों लोगों की मौत हुई, लेकिन इन मामलों को कभी नरसंहार की श्रेणी में नहीं रखा गया। उन्होंने सवाल किया कि यदि यहां 50 से अधिक मौतों को नरसंहार नहीं माना जाता, तो बांग्लादेश के मामलों में यह शब्द क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है।

मौलाना रशीदी ने स्पष्ट किया कि किसी भी धर्म, समुदाय या देश में हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटनाओं का मूल्यांकन करते समय एक समान और निष्पक्ष मापदंड अपनाया जाना चाहिए।