बैतूल। कथित रूप से ज़हरीले बताए जा रहे ‘कोल्ड्रिफ’ कफ सिरप से जुड़ा मामला अब और भी दर्दनाक मोड़ पर पहुंच गया है। इस दवा को लेने के बाद बीमार पड़े बैतूल जिले के चार साल के मासूम हर्ष यदुवंशी की नागपुर एम्स में 120 दिन चले इलाज के बाद मौत हो गई। सोमवार को पोस्टमार्टम के बाद जब उसका शव गांव टीकाबरी (बोरदेही) पहुंचा, तो पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। परिजनों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे और ग्रामीणों में आक्रोश गहराता जा रहा है।

साधारण सर्दी से शुरू हुआ जानलेवा संकट

परिजनों के मुताबिक सितंबर 2025 में हर्ष को हल्की सर्दी, खांसी और बुखार हुआ था। इलाज के लिए 26 सितंबर को उसे छिंदवाड़ा जिले के परासिया इलाके में एक निजी चिकित्सक के पास ले जाया गया। आरोप है कि वहां उसे ‘कोल्ड्रिफ’ नाम का कफ सिरप दिया गया। दवा लेने के कुछ ही समय बाद उसकी हालत बिगड़ने लगी। उल्टियां, कमजोरी और पेशाब न होने जैसी समस्याएं सामने आईं।
पहले स्थानीय अस्पताल और फिर बड़े मेडिकल सेंटर ले जाने के बाद डॉक्टरों ने उसे नागपुर रेफर कर दिया। अक्टूबर से वह एम्स में भर्ती था, जहां डॉक्टरों ने बताया कि उसकी दोनों किडनियां गंभीर रूप से खराब हो चुकी हैं। महीनों तक डायलिसिस और इलाज चलता रहा, लेकिन आखिरकार मासूम जिंदगी से हार गया।

पहले ही दी गई थी चेतावनी

हर्ष के चाचा श्याम देवा यदुवंशी ने पहले ही प्रशासन को शिकायत देकर आशंका जताई थी कि बच्चे की तबीयत बिगड़ने की वजह वही संदिग्ध सिरप है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डॉक्टर को दवा के दुष्प्रभावों की जानकारी होने के बावजूद उसे दिया गया।
22 नवंबर 2025 को एसडीओपी के निर्देश पर यह शिकायत परासिया थाने में दर्ज जहरीले कफ सिरप से जुड़े केस में शामिल की गई थी। पुलिस की केस डायरी में हर्ष का नाम क्रमांक 39 पर दर्ज है और जब्त की गई कोल्ड्रिफ सिरप की बोतल का भी जिक्र है।

नौ गिरफ्तारियां, लेकिन कई सवाल

अब तक इस मामले में दवा कंपनी, केमिकल सप्लायर, मेडिकल प्रतिनिधि और मेडिकल स्टोर से जुड़े कुल नौ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुंडीपुरा पुलिस ने अलग मामले में दो और आरोपियों को पकड़ा है।
इसके बावजूद पीड़ित परिवार और उनके वकील का कहना है कि परासिया के जिस निजी क्लीनिक से यह सिलसिला शुरू हुआ, वहां अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वकील संजय पटोरिया के मुताबिक पुलिस रिकॉर्ड में डॉ. एस.एस. ठाकुर और डॉ. अमित ठाकुर के नाम दर्ज होने के बाद भी न तो क्लीनिक सील किया गया और न ही उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए गए।

गांव में शोक, परिवार की न्याय की मांग

हर्ष की मौत के बाद टीकाबरी गांव में मातम पसरा हुआ है। परिवार का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई होती, तो शायद उनका बच्चा बच सकता था। परिजनों ने सरकार से आर्थिक सहायता, निष्पक्ष जांच और इस पूरे मामले में शामिल हर जिम्मेदार — चाहे वह डॉक्टर हो, दवा निर्माता हो या सप्लाई से जुड़ा कोई भी व्यक्ति — के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

दवा प्रणाली पर उठे सवाल

यह मामला केवल एक बच्चे की मौत नहीं, बल्कि दवाओं की गुणवत्ता, निजी क्लीनिकों की निगरानी और मेडिकल सप्लाई चेन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। लोगों में डर है कि अगर एक सामान्य खांसी-जुकाम की दवा जानलेवा बन सकती है, तो आम मरीज खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेगा।