जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शनिवार को आयोजित ‘द गिग इकॉनमी’ सत्र में देश में तेजी से बढ़ रहे गिग वर्कर्स और उनकी समस्याओं को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इस सत्र में अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य राकेश मोहन ने गिग इकॉनमी की मौजूदा स्थिति, इसके विस्तार और जरूरी सुधारों पर अपने विचार रखे।

‘10 मिनट डिलीवरी’ जैसी सेवाओं पर सवाल
राकेश मोहन ने बताया कि वर्ष 2021 में भारत में गिग वर्कर्स की संख्या करीब 77 लाख थी, जो 2025 तक 1.4 करोड़ और 2030 तक लगभग 2.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। उन्होंने ‘डिलीवरी इन 10 मिनट’ जैसी सेवाओं को खतरनाक बताते हुए कहा कि ऐसी अवधारणाओं को अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। साथ ही सुझाव दिया कि हर डिलीवरी पर ऐप कंपनियों से एक सेस वसूला जाए, जिसकी राशि सीधे गिग वर्कर्स के खातों में जाकर राष्ट्रीय पेंशन योजना जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में निवेश हो।

काम के घंटे और सुरक्षा व्यवस्था का अभाव
उन्होंने कहा कि भले ही गिग इकॉनमी रोजगार के नए अवसर पैदा कर रही है, लेकिन इसमें काम करने वालों को तय कार्य समय, दुर्घटना बीमा, सामाजिक सुरक्षा और प्रभावी शिकायत निवारण जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐप आधारित प्लेटफॉर्म के चलते कई बार काम अस्वीकार करने की स्वतंत्रता भी सीमित हो जाती है।

उपभोक्ता भी परेशान
सत्र में नीति विश्लेषक वंदना वासुदेवन ने कहा कि शिकायत निवारण व्यवस्था की कमी का असर सिर्फ गिग वर्कर्स पर ही नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं पर भी पड़ता है। केतकी कार्णिक ने इस बात पर जोर दिया कि गिग वर्कर्स को उनके श्रम के अनुरूप पारिश्रमिक मिलना चाहिए। वहीं लेखक और ब्रांड रणनीतिकार संतोष देसाई ने कंपनियों के बड़े मुनाफे और कामगारों को मिलने वाले कम वेतन के बीच गहरे अंतर की ओर ध्यान दिलाया।

सत्र के अंत में वक्ताओं ने नीति निर्माताओं से अपील की कि गिग इकॉनमी को अधिक संतुलित, न्यायपूर्ण और श्रमिकों के हित में ढाला जाए।