जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में रविवार को शामिल हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने जमानत और न्यायपालिका की चुनौतियों पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को दोषी तब तक नहीं माना जा सकता जब तक उसकी दोषसिद्धि न हो, और इसी आधार पर जमानत एक मौलिक अधिकार होनी चाहिए।
जमानत के मौलिक अधिकार पर जोर
वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी द्वारा उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने के संदर्भ में सवाल किए जाने पर चंद्रचूड़ ने कहा, “हमारा कानूनी ढांचा निर्दोष होने की धारणाओं पर आधारित है। यदि कोई व्यक्ति कई साल जेल में रहे और बाद में निर्दोष साबित हो जाए, तो उसके खोए हुए समय की भरपाई कैसे होगी?”
कब रोकी जा सकती है जमानत
पूर्व CJI ने स्पष्ट किया कि जमानत केवल तभी अस्वीकार की जा सकती है जब आरोपित फिर से अपराध करने का खतरा हो, सबूतों में छेड़छाड़ की संभावना हो या जमानत का फायदा उठाकर कानून से बचने का प्रयास हो। यदि ये स्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो जमानत अवश्य दी जानी चाहिए। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालत की जिम्मेदारी है कि वह जमानत देने से पहले मामले की पूरी जांच करे।
चंद्रचूड़ ने यह भी चिंता जताई कि जिला और सत्र न्यायालयों में जमानत खारिज करने के फैसले अक्सर न्यायाधीशों के डर के कारण होते हैं, जिससे मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच जाता है।
सुनवाई में देरी पर भी चिंता
पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय न्याय प्रणाली में मामलों की लंबित स्थिति और सुनवाई में देरी चिंताजनक है। उनका मानना है कि संविधान सर्वोच्च कानून है और इसमें कोई अपवाद नहीं है। देरी की स्थिति में आरोपी को जमानत का अधिकार मिलना चाहिए।
कॉलिजियम में सुधार का सुझाव
चंद्रचूड़ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए सुझाव दिया कि उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के कॉलिजियम में समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल किए जाएं, ताकि न्यायपालिका में जनता का विश्वास मजबूत हो। उन्होंने यह भी कहा कि रिटायरमेंट के बाद उन्होंने किसी पद को स्वीकार नहीं किया और वर्तमान में निजी जीवन का आनंद ले रहे हैं।